भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचारिणी देवियर्

रही; अधिनी कुमार्ग ने इसे अपने वश में करने के अनेकों प्रलोभन दिये, किन्तु इसका मन ब्रह्मचर्य से जरा भी न छिगा। अन्त में उन्होंने प्रसन्न हो कर क्यवन को अपने औपधोपचार से अत्यन्त सुन्दर युवक बना दिया।

कुछ लोगों का कहना है कि ब्रह्मचर्य-पालन का अधिकार केवल पुरुषों के ही लिये है, स्त्रियों के लिये नहीं। यह उनका निरा बाल-वाद है। परमात्मा ने पुरुष-स्त्री दोनों को एक ही गर्भ से उत्पन्न किया है। उन दोनों के जीवन का लक्ष्य भी एक ही बनाया है। दोनों को अपने शारीरिक, नैतिक और मानसिक विकास का समान अधिकार है, जो ब्रह्मचर्य से ही सिद्ध हो सकता है। फिर एक ही को क्यों ऐसा अधिकार मिलने लगा? स्त्रियों को ब्रह्मचर्य-पालन का अधिकार न देना, सभी दृष्टियों से घोर अन्याय और जघन्य पक्षपात ही समझा जायगा।

वपुता और धारिणी—श्रीमद्भागवत में लिखा है कि वपुता और धारिणी नाम की दो स्त्रियाँ थीं, जिन्हें ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने की इच्छा हुई थी। इसलिये दोनों ने अपने को विवाह-बन्धनों से मुक्त रख कर अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन किया और अन्त में उनको मोक्ष प्राप्त हुआ।

प्राचीन समय में कुछ ऐसी आदर्श स्त्रियाँ भी हो गई हैं, जिन्होंने लौकिक सुख को तुच्छ समझ कर, अपना जीवन अविवाहित व्यतीत किया है। इससे यह बात सिद्ध होती है कि समाज के कल्याण तथा स्वात्मानन्द के लिये स्त्रियाँ भी अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन कर सकती हैं।

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