भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य विज्ञान

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उसे मार डाला था। उसकी एक मुजा जाकर सुलोचना के आगे गिरी। उसे सन्देह हुआ। अतएव उन्होंने कहा कि यदि मैं मन वचन तथा कर्म से पतिव्रता होऊँ तो यह मुजा मेरे अंचल पर लिखे कि मैं तेरा पति हूँ तभी मेरे मन में विश्वास होगा कि मेरे पति मारे गये।

पेसा ही हुआ। उस मुजा ने यही बात लिख दी। फिर वे सब के समझाने दुमाने पर भी न रुकीं और अपने पतिका शीश श्रीरामचन्द्र के यहाँ से लेकर अभि-चित्ता में सती हो गईं।

सतों माझी—ये महाराज पाण्डु की पत्नी थीं। इन्होंने बहुत दिनों तक अपने पति की रक्षा के लिये ब्रह्मचर्य का पालन किया था। ये भी अपने पति के मरने पर पुत्रों को कुन्ती के अधिकार में रख पति के साथ सती हो गईं।

सती सुदक्षिणा—यह समाहृ दिलीप की भार्या थीं। इन्होंने बहुत दिनों तक ब्रह्मचर्य से रह कर पुत्र के लिये महर्षि वशिष्ठ की गो की सेवा की थी।

अभी अधिक दिन नहीं हुये कि यवनों के शासन-काल में हमारे देश की अनेक पतिव्रता और ब्रह्मचारिणी स्त्रियों ने धर्म के लिए अपने प्राण अग्निदेव को समर्पित किये थे।

सती सुकन्या—यह महर्षि च्यवन की पत्नी थीं। इनके पिता एक दिन वन में अहेर खेलने गये थे। वहाँ च्यवन ऋषि तपस्या कर रहे थे। इस बालिका ने अम वश उनक दोनों नेत्रों में काँटे गोद दिये। यह खबर उनके पिता को लगी। उन्होंने ने अपनी पुत्री को महर्षि की सेवा के लिये समर्पित कर दी। कुछ दिनों के उपरान्त सुकन्या युवती हुई, पर अपने पति की सेवा करतीं।