भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 234, कुल 380 में से

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सर्वोच्च ब्रह्मचारिणी सीताः

प्राणनाथ ! तुम विन जगमाहीं । मो कहँ सुखद कतहुँ फोड नाहीं ॥

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जिय विनु देह नदी विनु वारी । वैसहि नाथ पुरुष विन नारी ॥

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खग भुग परिजन नगर वन, वलफल वसन दुकूल । नाथ साथ सुर-सदन सम, पर्याशाल सुख-मूल ॥

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पावँ पवारि वैठि तब-छाहीं । करिहौ वायु मुदित मन माहीं ॥

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को भभु सँग मोहि चितवन हारा । सिंह वधुहि जिमि शशक सियारा ॥ मैं सुकुमारि नाथ वन योग् । तुमहि उचित तप मो कहँ भोग् ॥

( तुलु- रामा )

चे बाते कह कर सीता पृथ्वी पर गिर पड़ीं । यह दशा देख कर राम ने विचारा कि यदि मैं जानकी को यहीं छोड़ जाऊँगा तो यह जीती न रहेगी । अतः उन्होंने अपने साथ चलने की आज्ञा दे दी ।

रावण के हृद ले जाने पर लक्ष्म की अशोक-वाटिका में तप- स्विनी वैध में सीताजी कई वर्षों तक पति के ध्यान में मग्न रहीं । पराये पुरुष की ओर देखना भी वे पाप समझती थीं ।

उन्होंने रावण को कैछा फटकाराः—

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