भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य-विदान

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व्यभिचारिणी होने से सन्तान भी वैसी ही उत्पन्न होती है। माता के आचरण का गर्भस्थ बालक पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। शुक्रदेव तथा अभिमन्यु जैसे परम शान्ती एवं अद्वितीय वीर बालकों को माता के गर्भ में ही आत्मज्ञान एवं शास्त्र-सम्बालन की शिक्षा मिली थी। गर्भ-धारण करते ही माता को ब्रह्मचर्य सम्बन्धी सब नियमों का पालन करना चाहिये। प्रसूचारिणी, सुरलीला एवं विदुषी स्त्रियों की सन्तान भी उसकी भाँति सब गुणों में दृढ़ होती है।

८—ब्रह्मचर्य-युक्त गर्भाधान

“हर्मा त्वमिन्द्र मीदृषः सुपुत्रां सुभर्गां कृणु ।”

(ऋग्वेद)

हे वीर्य से परम ऐश्वर्यवान् पुरुष ! तू इस पत्नी को उत्तम पुत्रोंवाली और सौभाग्यवाली बना।

“प्रजनाथं स्त्रियः स्मृधाः, सन्तानार्थञ्च मानवम् ।”

(महुरथवि)

गर्भ धारण करने के लिये स्त्रियों और गर्भाधान करने के लिये पुरुषों की रचना हुई है।

प्रायः सभी महर्षियों ने स्त्रियों का उद्देश्य सन्तानोत्पत्ति माना है। यह कार्य वास्तव में बड़े महत्त्व और दायित्व का है। यही कारण है कि गर्भाधान की गणना पौष्ट्य संस्कारों में की गई है। शास्त्रकारों का मत है कि गर्भाधान ब्रह्मचर्य युक्त होना चाहिये। पर आज कल इस पर कुछ भी ध्यान नहीं दिया जाता। यही

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