ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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आदर्श माता
है। एक सुराश्रिता माता अपनी सन्तान को थोड़े ही दिनों में सब गुणों से सम्पन्न कर देती है।
माता का पद वास्तव में बड़े महत्व और उत्तरदायित्व का है। यदि माता अयोग्य हुई, तो सन्तान किसी काम की नहीं हो सकता। सन्तान के लिये माता की योग्यता की परम आवश्यकता होती है।
आजकल की दशा बड़ी विचित्र है। सामाजिक अवनति के कारण प्रायः अयोग्य बालिकायें माता-पद पर सुरोभित हो रही हैं। जब वे स्वयं ही संसार का कुछ अनुभव नहीं रखतीं तब भला वे अपनी सन्तान का क्या उचित प्रकार से लालन-पालन कर सकेंगी? ऐसी अवस्था में, गुणहीन, क्रूर, निर्बल, और निस्तेज सन्तान निकले, तो फिर आश्चर्य ही क्या है ?
महाभारत में युधिष्ठिर-मार्कण्डेय-संवाद है। उसमें युधिष्ठिर के पूछने पर मार्कण्डेयजीने इस प्रकार माता का महत्व वर्णलाया है:-
मातृस्तु गौरवाद्भ्ये, पितृनभ्ये तु मेनिरे ।
दुष्करं कुरुते माता, विवर्धयति वा प्रजाः ॥
किसी का मत है कि माता बड़ी है, और किसी के विचार में पिता बड़ा है। पर मैं कहता हूँ कि माता ही बड़ी है। क्योंकि वह सन्तान को पाल-पोस कर बड़ा करने का कठिन कार्य करती है।
आज तक जितने शूरवीर, विद्वान्, कीर्तिमान्, तेजस्वी और प्रतापी पुरुष हुए हैं, वे सब अपनी सदाचारिणी, पतिव्रता तथा सुयोग्य माता के द्वारा ही हुये हैं।
माता के लिये त्रज्ञाचारिणी होना अत्यन्त आवश्यक है।