ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
पृष्ठ 225, कुल 380 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मचर्य-विधान
२२२
सतीनां पादरजसा, सद्यः पूता वसुन्धरा ।
पतिव्रतां नमस्कृत्य, मुच्यते पायकाश्रयः ॥
संसार में जितने तीर्थ हैं, सब सती स्त्रियों के चरणों में हैं, सब देवताओं और मुनियों का तेज पतिव्रताओं में होता है । सती स्त्रियों की चरण-मूलि से तत्काल प्रथवी पवित्र हो जाती है । पतिव्रताओं की वन्दना करके मनुष्य पातक से छूट जाता है ।
७—आदर्श माता
“नास्ति मातुलमो गुरुः ।”
माता के समान बालक का संसार में दूसरा गुरु नहीं ।
यह बात बहुत सत्य है कि जैसी माता होती है, वैसी ही उसकी सन्तान भी होती है । प्रत्येक सन्तान पर उसकी माता के भले-पुरे गुणों का अवश्य प्रभाव पड़ता है । हमारी इस बात का समर्थन सुश्रुत और वाग्भट जैसे ऋषि-प्रणीत वैद्यक शास्त्रों में किया गया है । देखिये, धर्माचार्य मनु माता के सन्वन्ध में अपनी यह सम्मति देते हैं:—
उपाध्यायानन्दशाचार्य, आचार्यार्णो शतं पिता ।
सहस्रान्तु पितृग्माता, गौरवेणासि रिच्यते ॥
१० उपाध्याय के बराबर १ आचार्य, १०० आचार्य के बराबर १ पिता और १००० पिता के बराबर माता गौरव में बड़ी है ।
बालक-बालिकाओं पर उपाध्याय, आचार्य और पिता का उत्तम प्रभाव कदापि नहीं पड़ता, जितनाकि साता का प्रभाव पड़ता