ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
पृष्ठ 223, कुल 380 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मचर्य-विद्यान
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है कि स्त्री-जाति के अधिकार बहुत ही न्याय-संगत थे । उस समय ये वैदिक संस्कारों की अधिकारिणी थीं । यही कारण था कि घोषा, सूर्या, विश्ववरा, लोपासुरा तथा इन्द्राणी आदि जैसी विदुषी देवियाँ सन्तों की दर्शिका हुईं । उनका उल्लेख आज भी मंत्रों के साथ मिलता है । अब इससे घट्ट कर स्त्रियों की उन्नति और क्या हो सकती है !
अब हम महिलाओं के मूल महत्त्व, उपकार तथा सदगुणों के सम्बन्ध में लिखेंगे। प्रयासा-वाक्य महाभारत और मानव-धर्म-शास्त्र से उद्धृत करते हैं:—
अर्धं भार्यां मनुष्यस्य, भार्याश्रेष्ठतमः सखा ।
भार्यां मूलं जिवगंस्य, भार्यां मूलं तरिष्यतः ॥
पत्नी पुरुष की अर्धाङ्गिनी होती है—भार्या मनुष्य का सर्वोत्तम मित्र है—भार्या त्रिवर्ग ( धर्म, अर्थ और काम ) का कारण है और भार्या मोक्ष का भी साधन है ।
भार्यावन्तः क्रियावन्तः; सभायां क्रियमेधिनः ।
भार्यावन्तः प्रमोदन्ते, भार्यावन्तः श्रियान्विताः ॥
स्त्री वाले क्रियावान् हैं—स्त्री वाले गृहस्थ-धर्मी हैं—भार्या वाले प्रसन्न रहते हैं और स्त्री-युक्त ही धनवान् हैं ।
सखायः प्रविक्लिप्तेषु, भवन्नेयतः प्रियवदः ।
पितरौ धर्मकार्येषु, भवत्याचारस्य मातरः ॥
स्त्रियाँ एकान्त में मित्र, धर्म-कार्य में पितर और दुरवस्था में माता की भाँति प्रसन्नता, सहायता एवं सेवा करती हैं ।
क्रियान्तु रोचमानायां, सर्वतद्रोचते कुलम् ।
तस्मां त्वरोचमानायां, सर्वमेव न रोचते ॥