ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
पृष्ठ 232, कुल 380 में से
संदर्भ में पढ़ें२२९
वेदवृत्ती का अपूर्व ब्रह्मचर्य
फाँसना चाह्ता, पर उस ब्रह्मचारिणी का मन तिल भर भी न डिंग सका। रामचरितमानस में बहुत सत्य लिखा है:—
डनै न शम्भु शरासन कैसे। फामी-चचन सती-मन जैसे॥
अन्त में रावणने हार मान कर उसे बलात् अप्रुठ करना चाह्ता। उसने उसके लम्बे-लम्बे काले-काले केशों को पकड़ कर खँचना प्रारम्भ किया। इस पर उस परम तेजस्विनी महिला ने रावण को इस प्रकार मट्क दिया कि वह दूर जा गिरा। फिर वेदवती ने कहा—रे दुष्ट पापात्मा! तुने मेरे केशों का स्पर्श कर लिया। इस लिये पर पुरुष के छू जाने से मेरा ब्रह्मचर्य-व्रत खण्डित हो गया। अब मैं अपना कलुषित कलेश्वर किसी प्रकार नहीं रख सकती। ले देख ! मैं अभी इसका प्रायश्चित्त किये देती हूँ।
यह कह कर वह वहीं एक जलते हुये अग्नि-कुण्ड में कूद पड़ी और साक्षात् ब्रह्म-लोक में जा पहुँची। अन्यायी रावण हाथ मल कर रह गया।
धन्य है सती-शिरोमण्ये ! धन्य है ! अवश्य ही तुने अपूर्व ब्रह्मचर्य का परिचय दिया। तेरे पवित्र चरित्र तथा अदम्य आत्म-बल की कथा भारत की स्त्री-जाति के इतिहास में “शाबरुच्चन्द्रदिवाकरे” सुवर्णचूर्नों में लिखी रहेगी।
हमारी पाठिकाओं को इस ब्रह्मचारिणी के आदर्श चरित्र तथा मनोबल से शिखा लेनी चाहिये।