ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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बहुत प्रसन्न रहती हैं। जो कन्या इनको प्रसन्न करना चाहती हो, वह अवश्य ब्रह्मचर्य से रह कर विद्याभ्यास में लगी रहे।
१०—वेदवती का अपूर्व ब्रह्मचर्य
“किन्नामोति रमारूपा, ब्रह्मचर्य-तपस्विनी।”
ब्रह्मचर्य-तप की तपस्विनी लक्ष्मी-रूपिणी की को संसार में कुछ भी दुःखभ नहीं है।
प्राचीन समय में अक्षरशः ब्रह्मचर्य के प्रेमी न केवल पुरुष ही थे, वरन् कई स्त्रियाँ भी ऐसी हुई हैं, जिन्होंने ब्रह्मचर्य के लिये अपना अमूल्य जीवन समर्पित किया था। क्या पुरुष क्या स्त्री, जिस किसी को ब्रह्मचर्य का मधुर फल चखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, वही इस पर सुख हो गया है। इस बात को हम एक पौराणिक आख्यायिका द्वारा दिखलाना चाहते हैं:—
वेदवती नाम की एक ऋषिकन्या थी जो अत्यन्त सुन्दरी तथा सुशीला थी। वह पूर्ण युवती हो गई थी, पर जब भी उसका विवाह नहीं हुआ था। वह एक वन की पर्ण-कुटी में रह कर निरन्तर सपस्या करती थी। उसकी इच्छा भी विवाह करने की न थी। कारण यह था कि उसका मन ब्रह्मचर्य के पालन से बहुत शुद्ध और दृढ़ हो गया था।
एक दिन की बात है कि राजाओं का राजा रावण उसी मार्ग से आ निकला। उसकी दृष्टि वेदवती पर पड़ी। वह उसे देखते ही मोहित हो गया। उसने नाना प्रकार के प्रलोभनों में उसे