ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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ब्रह्मचारिणी सरस्वती
“वन्देतां परमेश्वरीं भगवतीं, बुद्धिभदां शारदाम् ।” ( श्लोक )
उस परमात्मस्वरूपा, ऐश्वर्यवती तथा बुद्धि-दायिनी शारदा को हम ( ब्रह्मा सहित ) नमस्कार करते हैं ।
सरस्वती का नाम संसार में बहुत ही विख्यात है । इन्हें लोग विद्या की देवी मानते हैं । इसी विचार से आज अस्सल्य लोग इनकी पूजा करते हैं ।
जिन लोगों के हृदय में विद्वान और ज्ञानवान बनने की अभिलाषा रहती है, वे तो प्रायः निरन्तर इस बड़ी शक्ति की मन, चक्षु तथा कर्म से आराधना करते हैं । इन्हें सब देवियों में इतनी प्रतिष्ठा और महानता क्यों मिली ? यह बात बहुत कम लोगों को ज्ञात है । अतः हम उसे बताना चाहते हैं ।
सरस्वती देवी विद्या की प्रधान प्रेरिका और रक्षिणी हैं । यह अधिकार इनको ब्रह्मचर्य-व्रत के पालन और वेदाध्ययन से प्राप्त हुआ है । इस प्रकार तो पुराणों के मत से ये ब्रह्माजी की पुत्री हैं । इन्होंने कभी अपना विवाह ही नहीं किया । इन्हें ज्ञान और विद्वान से इतना प्रेम हो गया था कि ये जीवन पर्यन्त भखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन करती रहीं । कई बार इनकी परीक्षा ली गई, पर ये तिल भर भी अपने व्रत से नहीं डिगीं । विवाह न करने का एक कारण यह भी था कि इन्होंने अपने सहरा एक भी वर नहीं देखा । इनके दीर्घ ब्रह्मचर्य और विद्याभ्यास से प्रसन्न हो कर सब देव-नरपंडित इनको माता समझने लगे । इनके पिता ब्रह्मा ने इन्हें वेद की अधिष्ठात्री बना दी । तब से आज तक ये उसी अवस्था में पूजित हो रही हैं । ये ब्रह्मचर्य और विद्याभ्यास से