ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
ब्रह्मचर्य-विज्ञान
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बहुत प्रसन्न रहती हैं। जो कन्या इनको प्रसन्न करना चाहती हो, वह अवश्य ब्रह्मचर्य से रह कर विद्याभ्यास में लगी रहे।
१०—वेदवती का अपूर्व ब्रह्मचर्य
“किन्नामोति रमारूपा, ब्रह्मचर्य-तपस्विनी।”
ब्रह्मचर्य-तप की तपस्विनी लक्ष्मी-रूपिणी की को संसार में कुछ भी दुःखभ नहीं है।
प्राचीन समय में अक्षरशः ब्रह्मचर्य के प्रेमी न केवल पुरुष ही थे, वरन् कई स्त्रियाँ भी ऐसी हुई हैं, जिन्होंने ब्रह्मचर्य के लिये अपना अमूल्य जीवन समर्पित किया था। क्या पुरुष क्या स्त्री, जिस किसी को ब्रह्मचर्य का मधुर फल चखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, वही इस पर सुख हो गया है। इस बात को हम एक पौराणिक आख्यायिका द्वारा दिखलाना चाहते हैं:—
वेदवती नाम की एक ऋषिकन्या थी जो अत्यन्त सुन्दरी तथा सुशीला थी। वह पूर्ण युवती हो गई थी, पर जब भी उसका विवाह नहीं हुआ था। वह एक वन की पर्ण-कुटी में रह कर निरन्तर सपस्या करती थी। उसकी इच्छा भी विवाह करने की न थी। कारण यह था कि उसका मन ब्रह्मचर्य के पालन से बहुत शुद्ध और दृढ़ हो गया था।
एक दिन की बात है कि राजाओं का राजा रावण उसी मार्ग से आ निकला। उसकी दृष्टि वेदवती पर पड़ी। वह उसे देखते ही मोहित हो गया। उसने नाना प्रकार के प्रलोभनों में उसे
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वेदवृत्ती का अपूर्व ब्रह्मचर्य
फाँसना चाह्ता, पर उस ब्रह्मचारिणी का मन तिल भर भी न डिंग सका। रामचरितमानस में बहुत सत्य लिखा है:—
डनै न शम्भु शरासन कैसे। फामी-चचन सती-मन जैसे॥
अन्त में रावणने हार मान कर उसे बलात् अप्रुठ करना चाह्ता। उसने उसके लम्बे-लम्बे काले-काले केशों को पकड़ कर खँचना प्रारम्भ किया। इस पर उस परम तेजस्विनी महिला ने रावण को इस प्रकार मट्क दिया कि वह दूर जा गिरा। फिर वेदवती ने कहा—रे दुष्ट पापात्मा! तुने मेरे केशों का स्पर्श कर लिया। इस लिये पर पुरुष के छू जाने से मेरा ब्रह्मचर्य-व्रत खण्डित हो गया। अब मैं अपना कलुषित कलेश्वर किसी प्रकार नहीं रख सकती। ले देख ! मैं अभी इसका प्रायश्चित्त किये देती हूँ।
यह कह कर वह वहीं एक जलते हुये अग्नि-कुण्ड में कूद पड़ी और साक्षात् ब्रह्म-लोक में जा पहुँची। अन्यायी रावण हाथ मल कर रह गया।
धन्य है सती-शिरोमण्ये ! धन्य है ! अवश्य ही तुने अपूर्व ब्रह्मचर्य का परिचय दिया। तेरे पवित्र चरित्र तथा अदम्य आत्म-बल की कथा भारत की स्त्री-जाति के इतिहास में “शाबरुच्चन्द्रदिवाकरे” सुवर्णचूर्नों में लिखी रहेगी।
हमारी पाठिकाओं को इस ब्रह्मचारिणी के आदर्श चरित्र तथा मनोबल से शिखा लेनी चाहिये।
अक्षचर्य-विज्ञान
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११—सर्वोच्च ब्रह्मचारिणी सीता
“सीता सर्वगुणोपेता, चार्या पतिपरायणा ।”
(सूक्ति)
सीता सब गुणों से भूषित और श्रेष्ठ पति (राम) की सेवा करनेवाली थीं ।
जैसे श्रीराम एक पत्नी-व्रत गृहस्थ ब्रह्मचारी थे, वैसी ही सीता भी पतिपरायणा आदर्श-पतिव्रता-थीं। रामायण भर में सीता के चरित्र में कई प्रसङ्ग ऐसे आये हैं, जिनसे उनके मानसिक ब्रह्मचर्य, अद्वितीय पति-प्रेम, सत्यनिष्ठा और धर्म-पालन आदि अनेक गुण प्रकट होते हैं । यदि भारतवर्ष की स्त्रियों इनके चरित्र को पढ़कर अपना जीवन सुधारें, तो फिर कहना ही क्या है ।
अयोध्या में श्रीराम के वन-गमन के समय उन्होंने पति के साथ चलने का प्रबल अनुरोध किया, जो वर्णन के बाहर है । श्रीराम ने बहुत कुछ उपदेश दिया, पर पतिप्राणा सीता ने बड़ी नम्रता से उनका खण्डन किया, जो तुलसीकृत रामायण में देखने योग्य है ।
सीताजी ने बड़े विनयशील और नीतियुक्त वचनों में श्रीराम की बातों का खण्डन इस प्रकार किया:—
तत्तु धन धाम धरणि पुर राज् । पति विहीन सब शोक समाज् ॥ भोग योग-सम भूषण भारु । यम-यातना सरित संसारु ॥
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सर्वोच्च ब्रह्मचारिणी सीताः
प्राणनाथ ! तुम विन जगमाहीं । मो कहँ सुखद कतहुँ फोड नाहीं ॥
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जिय विनु देह नदी विनु वारी । वैसहि नाथ पुरुष विन नारी ॥
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खग भुग परिजन नगर वन, वलफल वसन दुकूल । नाथ साथ सुर-सदन सम, पर्याशाल सुख-मूल ॥
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पावँ पवारि वैठि तब-छाहीं । करिहौ वायु मुदित मन माहीं ॥
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को भभु सँग मोहि चितवन हारा । सिंह वधुहि जिमि शशक सियारा ॥ मैं सुकुमारि नाथ वन योग् । तुमहि उचित तप मो कहँ भोग् ॥
( तुलु- रामा )
चे बाते कह कर सीता पृथ्वी पर गिर पड़ीं । यह दशा देख कर राम ने विचारा कि यदि मैं जानकी को यहीं छोड़ जाऊँगा तो यह जीती न रहेगी । अतः उन्होंने अपने साथ चलने की आज्ञा दे दी ।
रावण के हृद ले जाने पर लक्ष्म की अशोक-वाटिका में तप- स्विनी वैध में सीताजी कई वर्षों तक पति के ध्यान में मग्न रहीं । पराये पुरुष की ओर देखना भी वे पाप समझती थीं ।
उन्होंने रावण को कैछा फटकाराः—
संहाचर्य-विज्ञान
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सुख धरि श्रोत कहति वैदेही । सुमिरि अवध-पति परम (सनेही) ॥ शुभ ! सुने हरि आनेसि मोही । अधम निखज लाज नहि तोही ॥
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राक्षसों के संहार हो जाने पर विभीषण ने सीता को लाकर उपस्थित किया । राम के कहने से उनकी अगिनपरीक्षा हुई, उन्होंने यह कह कर अग्नि में प्रवेश किया:—
जो मन कम वच मम उर माहीं । तजि रघुवीर आन गति नाहीं ॥ तौ कृशातु खब की गति जाना । मो कई होइ श्रीखण्ड खमाना ॥
और वे सब के सम्मुख निष्पापा और सबरिजा सिद्ध हुईं । श्रीराम उन्हें लेकर अयोध्या लौटे ।
जब श्रीराम ने उन्हें गर्भवती की अवस्था में हो वन में निकाल दिया तो वे महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में रहने लगीं । वहाँ उनके दो पुत्र भी हुये । अन्त में श्रीराम के सम्मुख पुनः जानकी की परीक्षा का समय आया । महर्षि ने भी पूर्ण रूप से उनकी निष्पापता और प्रतिनिष्ठा का परिचय दिया । उस समय सीता के मुख से जो वाक्य निकले वे वास्तव में मन्तन करने ही योग्य हैं । उन्होंने कहा:—
यथाऽहं राघवादन्ये, मनसापि न चिन्तये । तथा मे माधवी देवि, विवरं दातुमर्हति ॥
हे पृथ्वी देवि ! यदि मैंने राम के आतिरिक्त किसी का ध्यान मन में भी न किया हो, तो तुम मुझे अपने पास स्थान दो ।
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गृहस्थ ब्रह्मचारिणी देवहूती
उनकी इस बात से घृण्यी में एक स्थान हो गया और वे उसमें घृण्यी देवी के साथ लीन हो गईं।
अब पाठिकायें सीता के आदर्श ब्रह्मचर्य का परिचय भली भाँति पा गईं होंगी। उनमें कितनी आत्म-शक्ति, निर्भीकता और सत्यप्रियता थी। उनके कथन से कितना साहस और पति-प्रेम टपक रहा है। अतः सीता के उच्च चरित्र के पढ़ने का यही अभिप्राय है कि तुम भी उन्हीं की भाँति पतिव्रता बनने का उद्योग करो।
१२—गृहस्थ ब्रह्मचारिणी देवहूती
“भार्यामूलं शिवगौर्यं, भार्यामूलं तरिष्यतः।”
(महाभारत)
स्त्री धर्म, अर्थ और काम का मूल है। यह मोक्ष का भी साधन है।
“या नाशे पतिभक्ता स्यात्सत्वा सदा ब्रह्मचारिणी।”
(सृष्टि)
जो स्त्री केवल अपने पति से अनुराग रखती है, वह सर्वदा ब्रह्मचारिणी कहलाती है।
कुछ लोगों का मत है कि जिस स्त्री का विवाह हो गया, वह ब्रह्मचारिणी नहीं रह जाती। पर यह बात भ्रम-मूलक है। गृहस्थाश्रम में भी रहकर स्त्री-पुरुष ब्रह्मचर्य का पालन कर सकते हैं। मनु आदि धर्माचार्यों का कहना है कि नियमित सभ्य में सन्तान के लिये प्रेरित करना ब्रह्मचर्य है। फिर ऐसी अवस्था में एक
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ब्रह्मचर्य-विज्ञान
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नियत समय तक गृहस्थी में धर्म युक्त वीर्य के संरक्षण को क्यों न ब्रह्मचर्य कहा जाय ? जो स्त्रियाँ केवल अपने पति से वचित समय पर संसार के हित की इच्छा से सहवास कर गर्भ धारण करती हैं, वे भी ब्रह्मचारिणी हैं । ऐसी लियों की सन्तान सर्वदा सदगुणवाली होकर फलती-फूलती है ।
पुराणों में एक कथा महासती देवहूती की आई है । कदाचित् हमारी पाठिकयें भू इस नारी-रत्न का नाम सुन चुकी हों । ये प्रसिद्ध राजा स्वार्थसुख मनु की पुत्री थीं । इनका जिवाह कर्दम ऋषि से हुआ था । वे भी ज्ञान, विद्या, बुद्धि और धर्म में बड़े आदर्श पुरुष थे । देवहूती भी अत्यन्त सुशीला, परम विदुषी, धर्म-परायणा, सदाचारिणी एवं पतिव्रता स्त्री थीं । इन्हीं के कारण इनकी तीन सन्तानें संसार में सुप्रसिद्ध हुईं । अरुन्धती और अनुसूया नाम की दो पुत्रियाँ थीं, जिनमें पहली का विवाह महर्षि वशिष्ठ से और दूसरी का महासुनि अत्रि से हुआ था । एक पुत्र जिनका कि नाम कपिल सुनि था । ये अद्वितीय तत्त्वज्ञान साक्ष्य शास्त्र के आचार्य हुये ।
बहुत दिन तक गृहस्थाश्रम के सुखों का उपभोग कर लेने पर, कर्दम ऋषि ने तपस्या करने के लिये देवहूती से आहा-मंगी । उस समय उस देवी ने अपने भ्रिय पति को जाने की आहा दे दी । तत्पश्चात् वे स्वयं ब्रह्मचर्य-पालन और ब्रह्मज्ञान के चिन्तन में अपना समय बिताने लगीं । वे अपने पुत्र-से आध्यात्मिक विचारों को ग्रंथ द्वारा प्रकट कर, उनसे शङ्का-समाधान करती थीं । यह बात आज भी विख्यात है । यदि ऐसी आदर्श ब्रह्मचारिणी भावा न होती; तो हमें एक महात् तत्त्ववेत्ता की उपलब्धि न होती ।
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स्त्री-जाति का पतन
वास्तव में अितेन्द्रिया, संस्थशीला, शुभ गुण-युक्ता, पति-प्रेमा, रोग-रहिता, दयावती, क्षमावती, सन्तान-वत्सला, सदाचारिणी, अच्युतनशीला, गृह-कर्म-कुशला एवं सर्व गुण-सम्पन्ना स्त्री ही आदर्श माता हो सकती है। ऐसी ही माता से देश, समाज, धर्म और जाति का यथेष्ट उपकार हो सकता है।
१३—स्त्री-जातिका पतन
सूक्ष्मेभ्योऽपि प्रसन्नेभ्यः, त्रितयो रक्ष्या विशेषतः ।”
साधारण से साधारण दोनों से भी स्त्रियों की रक्षा विशेष रूप से करनी चाहिये।
किसी भी समाज के उत्थान और पतन का कारण विशेष कर उस देश का स्त्री-मण्डल होता है। समाज का अत्यन्त आवश्यक तथा सहायक अङ्ग स्त्री-समुदाय माना गया है। यदि वह हीन हो जाय, तो समाज की दुर्गति निश्चित है !
हमारा भारतवर्ष क्यों उच्च दशा को प्राप्त था ? हमारी हिन्दू-जाति किसके चल पर उन्नत हुई थी ? यहाँ की सुशिक्षिता, पतिव्रता एवं आदर्श गुणवती स्त्रियों के कारण। पुरुष कभी भी उत्तम कार्य नहीं कर सकते, जब तक कि उनमें घर में सभी साध्वी पत्नी न हो। इस सम्बन्ध में नीति-शास्त्र का एक श्लोक उद्धृत कर देना बहुत वचित जान पड़ता है:—
“यस्यास्ति भार्या पठिता सुशिक्षिता, गृहकिया-कर्म-कुसुसाधने क्षमा ॥
ग्रहार्च्य-विश्वास
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स्वजीविकां धर्म-धनार्जनं पुनः, करोति निश्चितमथो हि भानवः ॥
जिसको छो पढ़ी-लिखी, सुशिक्षिता, गृह-कार्य तथा अन्य व्यवहारों में सुयोग्या होती है—वह पुरुष चिन्ता-रहित प्रसन्नमनः होकर अपने धर्म तथा धन का उपार्जन कर सकता है ।
काल के प्रभाव से अब खियों की प्राचीन मर्यादा का लोप हो रहा है। हिन्दू-जाति में अब खियों केवल पैर की पनही समझी जाने लगी हैं। उनकी शिक्षा-दीक्षा का प्रबन्ध ही दूर हो गया। पुरुष-जाति इनको पढ़ना-लिखाना एक अपमान और लज्जा की बात मानने लगा। इस प्रकार अयोग्य खियों की गृहस्थी के गुरुत्वर भार सौंपे जाने लगे और देश रसातल को पहुँच गया। खियों के इसी सम्बन्ध का एक हिन्दी कवि ने अपने पद्य में कैसा अच्छा चित्र खींचा है:—
सोचो ! नरों से नारियों किस बात में हैं कम हुईं । मध्यस्थ में शास्त्रार्थ में वे भारती के सम हुईं ॥ होती अनेकों रहीं गार्गी और मैत्रेयी जहाँ । हैं अब अविद्या-मूर्ति सी कुल-नारियों होती बहाँ ॥
(भारत-भारती )
जिस स्त्री-जाति ने शङ्कराचार्य और रामानुजाचार्य जैसे वेदान्ती—राणा प्रताप और शिवाजी जैसे शूर वीर—समर्थ रामदास, रामकृष्ण और सुरदास जैसे महात्मा—कालिदास, तुलसी दास और भूषण जैसे कवि, दयानन्द जैसे समाज सुधारक और सिलक तथा गान्धी जैसे देशसेवक उत्पन्न किये, उसकी दुर्दशा, किसे न असह्य जान पड़ेगी ?
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व्यभिचारिणी की दुर्दशा
आज तक जितने सत्पुरुष उत्पन्न हुये हैं; वे सब सदाचारिणी माताओं के कारण ही हुये हैं । स्त्री-जाति का सुधार ही राष्ट्रीय सुधार समझना चाहिये । जो जाति उन्नत होना चाहती है, वह स्त्रियों में सदगुणों का पहले प्रचार करे ।
१४—व्यभिचारिणी की दुर्दशा
“व्यर्थिकारण शुक्रस्य, ब्रह्म-हत्यामवान्मुत्पत्ति ।”
( भविष्य-खण्ड )
युधा वीर्य का नाश करने से ब्रह्म-हत्या का पाप लगता है ।
“रजोदर्शनतः पूर्व, न स्त्री-संसर्गं माचरेत् ।”
( भविष्यपुराण )
रजोदर्शन होने से पहले स्त्री से समागम करना निषेध है ।
पुरुष-जाति में व्यभिचार तो बड़ा ही है, पर उनके प्रभाव से स्त्रियों में भी इस दोष का प्रचार हो रहा है । शास्त्रों के मत से अपने पति के साथ भी अनियमित मेलन करना भी व्यभिचार है, और इससे भी पाप होता है । सती स्त्रियाँ वे ही हैं, जो भिन्न समय पर सन्तान की इच्छा से पति का समागम करती हैं । अस्मय में सम्भोग-रत होने से पुरुष के वीर्य और स्त्री के रज का नाश होता है । वीर्य और रज के अधीन जीवन है । इसलिये दोनों को जीवन-हत्या का पातक होता है ।
जो स्त्रियाँ बाल्यावस्था से ही विषय-वासना में लग जाती हैं वे कभी सुख नहीं पातीं ।
ब्रह्मचर्य-विज्ञान
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स्त्रियों के दुराचारिणी होने से कुल, धर्म, जाति और देश का अधःपतन हो जाता है। जिस देश का नारी-समाज पतित होता है, वहाँ का पुरुष-समाज भी घुषित और अवनत स्वर्ग हो जाता है। यद्यपि स्त्रियों की दूषित करने का लाञ्छन पुरुषों पर ही लगाया जा सकता है, तथापि अज्ञानता के कारण स्त्रियाँ भी अपने नाश का कारण बन रही हैं।
हमने देखा है कि सधवा स्त्रियों की अपेक्षा विधवायें अधिक स्वस्थ और नीरोग रहती हैं। उनकी आयु भी बहुत बड़ी होती है और वे परिश्रम भी बहुत करती हैं। इसका प्रधान कारण हमें यही ज्ञात होता है कि उन्हें ब्रह्मचर्य-व्रत के पालन करने का अधिक अवसर मिलता है। पति के न रहने पर उनका जीवन संयमित और न्यभिचार रहित हो जाता है। ऐसा भी देखा गया है कि जो स्त्रियाँ अपने पति के जीवन-काल में बहुत अखस्थ रहती थीं, वे भी पति के मर जाने पर द्रष्टृ पृष्ट हो गई हैं।
अब हम स्त्रियों की उन दुर्बलताओं का वर्णन करते हैं, जो अति मैथुन तथा पापाचरण से उत्पन्न होती हैं:—
१—न्यभिचार से स्त्रियों का सौन्दर्य नष्ट हो जाता है।
२—युवावस्था में ही सब अङ्ग शिथिल हो जाते हैं।
३—बुद्धि, बल और गुणों का ह्रास होने लगता है।
४—गर्भ धारण करने की शक्ति नष्ट हो जाती है।
५—बहुत सी स्त्रियों के बालक नहीं होते, और होते भी हैं तो जीते नहीं।
६—राजयक्ष्मा, प्रदूर, रक्तवात-विकार, संयहृषी, शुल तथा अन्य प्राणनाशक रोग उत्पन्न हो जाते हैं।
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स्त्री-जाति पर विदेशी मत
७—हृदय में दुर्बलता, भोजन में अरुचि, भोग में आसक्ति, चित्त में अशान्ति तथा शयन में अनिद्रा हो जाती है ।
८—क्रोध, अतुल्लाह, अधैर्य, अविचार, अकार्य और लोभ बाला स्वभाव बन जाता है ।
९—जीवन भारतूप और दुःखमय जान पड़ने लगता है ।
१०—रोग पर रोग लगे रहते हैं, जिससे असमय में ही मृत्यु हो जाती है ।
आजकल प्रायः स्त्रियाँ इन दुर्दशाओं को भोग रही हैं । अत-एव यदि वे अपने को इनसे बचाना चाहें, तो अपने पत्नियों को भी सदाचारी बनायें और स्वयं सदाचारिणी बनने का उद्योग करें । यदि स्त्रियाँ चाहें, तो यह कोई उनके लिये बहुत कठिन काम नहीं है । धीरे-धीरे अभ्यास से अपने दोषों को निश्चय पूर्वक वे दूर कर सकती हैं ।
१५—स्त्री-जाति पर विदेशी मत
इस शीर्षक में हम उन विदेशी विद्वानों का मत उद्धृत करते हैं, जिन्होंने कि स्त्री-जाति के सम्बन्ध में बहुत विवेचना कर लेने पर ही अपना विचार प्रकट किया है :—
साध्वी स्त्री संसार के सब ऐश्वर्यों से वद्ध कर है । वह एक स्वर्गीय देवी है, जिसमें सम्पूर्ण दिव्य गुण निवास करते हैं ।
( जर्मनी टेडर )
संसार के आचार को बनाना, गृह का प्रबन्ध करना तथा
ग्रहचर्य-विज्ञान
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कोमलता, प्रेम, और सहन-शीलता से जीवन की कठिन और विषम यात्रा को सरल और सुखद बनाना खी का हा काम है ।
( टामसन )
इस संसार में खियों का राज्य है । ये ही माताओं, पुत्रियों और पत्नियों के रूप में इस जीवन के सङ्कल्पित मार्ग को विस्फुट बनाती हैं ।
( मांट गुमरी )
किसी देश की परम्परा और जाति-नियम कुछ भी हो, पर धर्म और सद्भाव की निष्पत्ति खियों के हाथ में होती है ।
ये देवियों हमारी पूजनीया हों या सहचरी नायिका हों या परिचारिका, इनका अखण्डनीय प्रभाव हम पर पड़ता है ।
( माटिन )
वह कौन सा आकाश है, जहाँ खी का प्रेम नहीं चढ़ता और वह कौन सा पाताल है, जहाँ वह नहीं डवरता ।
( कार्लिडन )
खी हमारे अधिध्यास और कठोरता से सुखे हृदय को प्रफुल्लित कर देती है । इन्हीं देवियों के प्रताप से नरक भी स्वर्ग बन जाता है ।
( लार्ड बाइरन )
मेरा जहाँ तक अनुभव है—मैं कह सकता हूँ कि सर्वत्र खियों कोमल-हृदया, दयाशीला, धर्म-परायणा और परोपकारिणी होती हैं । श्रद्धा, लज्जा और दया—ये तीन सहेलियाँ ती कभी इनका साथ नहीं छोड़तीं ।
( लिबार्ड )
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खी-जाति पर विदेशी भत
पुरुष को प्रसन्न रखने में खी की प्रसन्नता है। वह पुरुष की प्रसन्नता के लिये प्रायों को बलि तक दे सकती है।
( काउंटी पटमोर )
संसार-वाटिका में सती खी सबसे सुन्दर सुमन है। उसकी कोमलवा, उसकी सुगन्धि और रमणीयता—एक से एक बढ़ कर मनोहर है।
( थोकरे )
खी की सुन्दरता किस बात में हैं ? परोपकार और निश्छल भक्ति में तथा सन्तोष और सहनशीलता में—ये गुण उसके लावण्य को चमकाते, तेज को बढ़ाते तथा उसे देवता बनाते हैं।
( मिल्टन )
प्रसन्न मन और प्रसन्न वदन होना साहित्युत, सहास्रभूति, दुष्टि की सीमता, स्मृति की पीड़ता और दूसरे के मनको सहज में खींच लेना—इन गुणों में स्त्रियों अद्वितीय हैं।
( गबबोल )
देवियों के हृदय पर एक बार जो बात अङ्कित हो जाती है, उसका भिटाना फिर बड़ा कठिन हो जाता है।
( थेकरे )
इस बात को अपने मस्तिष्क से निकाल दो कि तुम स्त्रियों से गौरवशाली हो ! स्त्रियाँ तुम्हारी इच्छाओं और महत्वाकांक्षाओं की सङ्गिनी हैं। वे तुम्हारे सुख-दुःख में सहायता देती हैं।
( बेजिनी )
षडक्षरः रूपसु
१—ब्रह्म-चन्द्रना
ॐ यथा मधु मधुकृतः सम्भरन्ति मधावधि । एवा मे आश्विना वर्चं श्रामनि भ्रियताम् ॥
( भववैवेर )
जिस प्रकार से भ्रमर पुष्पों का रस लेकर मधु बनाता है और उसे मधु-चक्र में भरता है, उसी प्रकार हे सूर्य और चन्द्र रूपी परमात्मन् ! हमारे अन्तःकरण में भी तुम आत्म-वेज को प्रकाशित करो ।
तुम सूर्य और चन्द्र हो ! सूर्य से जगत् की जीवनी-शक्ति स्रष्टा और चन्द्र से शान्ति-दायिनी शीतलवा प्राप्त होती है । ब्रह्मचारी को इन दोनों की आवश्यकता होती है । तुम भ्रमर की भाँति सारतलों को ग्रहण करते हो । तुम्हारे पास अखिल सद्-गुण विद्यमान हैं, जिन के प्राप्त होने से ही आत्म-वेज प्रकट हो सकता है । हम इसी के लिये ब्रह्मचर्य की साधना करते हैं । हम भी मधुप बनना चाहते हैं । हमारी इच्छा है कि हम अपने शरीर में वीर्य को बढ़ाने का प्रयत्न करें । जैसे मधु के एकत्र करने से लोक को सुख पहुँचता है, उसी भाँति ब्रह्मचर्य के सिद्ध होने से सबः
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शरीर का सार
लोगों को मधुरता मिलती है। अतः हे प्रभो ! हमें वही ज्ञान दो जिससे हमारा व्रत पूर्ण हो। हम अपनी ही नहीं, संसार की सेवा के लिये ही यह वरदान माँग रहे हैं।
२—शरीर का सार
“शुकायत्तं चलं पुंसः।”
( वैश्वक )
वीर्य के अधीन मनुष्य का शारीरिक बल रहता है।
संसार के सभी पदार्थों में एक सार तत्व रहता है। उसके बल से ही वह सुरक्षित और मान्य होता है। सार तत्व के बिना किसी वस्तु की कभी स्थिति नहीं हो सकती। बड़े-बड़े वैज्ञानिकों का सिद्धान्त है कि एक भी पदार्थ सत्ता से हीन नहीं है। जब तक उसका अस्तित्व है, तब तक उसकी इस विरोध शक्ति का लोप नहीं हो सकता।
मनुष्य शरीर में भी एक सार तत्व है। उसी के रहने से वह अपना जीवन धारण कर सकता है। उसके बिना उसकी शारीरिक अवस्था एक क्षण भी नहीं चल सकती। लोग इस सार तत्व को 'वीर्य' कहते हैं। जो लोग बुद्धिमान हैं, वे यल-पूर्वक इसे अनुपम 'रत्न' समझ कर इसकी रक्षा करते हैं।
कुछ तत्वज्ञानियों का कहना है कि जब तक शरीर में वीर्य की स्थिति रहती है, तब तक मनुष्य मर नहीं सकता। वीर्य का नाश ही जीवन का नाश है। मृतक होने की दशा में वीर्य का
प्रसन्नचर्य-विधान
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पूर्वी रूप से क्षय हो जाता है। इस मत का अभिप्राय यह है कि वीर्य शरीर का वह अस्तित्व है, जिसके चल पर वह अपना कार्य सन्पादित कर सकता है।
हमारे वैश्वक-शास्त्र के आचार्यों ने इस वीर्य पर बहुत उत्तम विचार किया है। उन्होंने भी इसको सार-पदार्थ माना है। प्रायः सब ने इसकी रक्षा के लिये लाभप्रद उपदेश किये हैं।
वीर्य की रक्षा करने वालों का शरीर सुदृढ़, आत्मा सन्तुष्ट तथा मन प्रसन्न रहता है। वीर्यवान् पुरुष ही इस संसार में स्वस्थ शरीर और निर्भय चित्त रह सकते हैं। अतः मनुष्य-जाति का कर्तव्य है कि शरीर—रक्षा और सद्बुद्धि की सिद्धि के लिये इस अमृत रूपी वीर्य का सन्धन्य करे। भ्रम-वश कभी इसका नाश करने में तैयार न हो।
आहारस्य परं धाम, शुक्रं तद्व्यवमात्मनः।
क्षये यस्य बहून् योगान्मरणं वा नियच्छति ॥
( चरक-संहिता )
मनुष्य के भोजन का सब से उत्कृष्ट अंश वीर्य है। अतएव यज्ञ साहित उसकी रक्षा करनी चाहिये। क्योंकि वीर्य के क्षय होने से अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं और इसका अन्तिम परिणाम मरण भी है।
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वीर्य की उत्पत्ति:
३—वीर्य की उत्पत्ति
“शुक्रतेजो रेतसीच, वीज-वीर्येन्द्रियाणि च ।”
(अमर-कोष)
मनुष्य-शरीर में रहने वाले सार पदार्थ के इतने नाम हैं— शुक्र, तेज, रेतस्, वीज, वीर्य और इन्द्रिय ।
“वीर्यं सर्वाधिसावकम् ।”
वीर्य सध प्रकार के अर्थों का साधने वाला है ।
मनुष्य जो कुछ भोजन करता है, वह पहले पाकस्थली में जाकर रंजित होता है । आहार के पचने पर रसादि सात धातुयें कम से बनती हैं । आहार का अन्तिम और सर्वोत्तम परिणाम वीर्य है । यह अत्यन्त उपयोगी और जीवन तत्व वाला होता है । शरीर के लिये सातों धातुयें आवश्यक हैं । अतएव वैद्यक-शास्त्र के अनुसार हम उनका यहाँ पर वर्णन करते हैं ।
रसाद्रकं ततो माल्नें, मांसान्मैदः प्रजायते ।
मैदस्यास्थित्ततो मज्जा,मज्जायाः शुक्रसम्भवः॥
( शुश्रूषाचार्य )
भोजन के पचने पर रस, रस से रक्त, रक्त से मांस, मांस से मैद, मैद से अस्थि, अस्थि से मज्जा और मज्जा से वीर्य उत्पन्न होता है ।
इससे यह प्रकट है कि सप्तम धातु वीर्य है । यह मज्जा से उत्पन्न होता है । यही शरीर का जीवन और आधार है । अब पाठक समझ गये होंगे कि वीर्य कैसे बनता है और शारीरिक धातुओं में उसका कौन सा स्थान है ?
ऋग्वेद-विधान
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४—ओज और वीर्य
“ओजोऽस्योजो मयि येहि ।”
( यजुर्वेद )
हे परमेश्वर ! तुम जीवन-तत्व हो । अतः तुम हमें उसे प्रदान करो !
मनुष्य-शरीर जिस मूल शक्ति के कारण सजीव रहता है, उसका नाम वैद्यक-शास्त्र वालों ने ‘ओज’ रखा है । यह ओज देह की सम्पूर्ण धातुओं का सार और मानवी जीवन शक्ति का आधार है । उसके घटने से आयुर्वेद की दृष्टि और घटने से चीन्धता आती है । इस सम्बन्ध में आर्य वचन देखने योग्य हैः—
ओजस्तु तेजो धातूनां, शुक्लान्तानां परस्मैस्तु ।
यज्ञाशे नियतं नाथो, यस्मिंस्तिष्ठति जीवनम् ॥
( बृहद वामदेव )
ओज रस से लेकर-वीर्य-पर्यन्त धातुओं का तेल है, जिसके नष्ट होने पर कोई जीवित नहीं रह सकता । इसके रहने पर ही जीवन धारण किया जा सकता है ।
यह बात विदित हो गई कि ओज अमुकं तत्व है । अब यह प्रश्न होता है कि यह रहता किस स्थान पर है ? इस विषय में भी वैद्यक का मत इस प्रकार हैः—
“हृदयस्थमपि व्यापि, देहस्थिति निवन्धनम् ।”
वह ओज प्रधानसत्ता हृदय में रहता है, और वहीं से सब अङ्गों में पहुँचकर उनकी रक्षा करता है ।
वैद्यक-शास्त्र में ‘वीर्य’ की उपधातु को ‘ओज’ माना गया है । पर कुछ आचार्यों के मत से यह सात धातुओं से प्रथक् माना
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ओज और वीर्य
गया है। हमारे, मत से भी यह स्वतन्त्र और सर्व श्रेष्ठ तत्व है, जो वीर्य की शक्ति के रूप में सर्व शरीर में विद्यमान रहता है। अब हम इसका विशेष वर्णन भी यहाँ पर देते हैं:—
ओजः सर्वं शरीरस्थं, क्षिण्णं शीतं स्थिरं सितम् ।
सोमात्मकं शरीरस्थं, बलं पुष्टिं करं मतम् ॥
( योग-विन्तामणि )
ओज का निवास सब शरीर भर में है। यह चिकना, शीतल स्थिर, उज्ज्वल होता है। यह शरीर भर में तेज फैलाने वाला और बल-पुष्टि का बढ़ाने वाला है।
वातव्य में ऊपर का ओज ही जीवन तत्व है। यह वीर्य की अधिकता से बढ़ता और न्यूनता से घटता है। इसके अधीन शारीरिक और मानसिक समस्त शक्तियाँ मर्यादित होती हैं। ब्रह्मचर्य के पालन करने से ओज का नाश नहीं होता! ब्रह्मचारियों का ही शरीर ओज से परिपूर्ण रहता है, और वे ही हृष्ट-पुष्ट, सुन्दर, सहिष्णु, बली, विद्वान् विनम्र एवं शोभन् देखे जाते हैं। उनकी आगु भी ही वर्षा से कम की नहीं होती। न्यमिचारी पुरुष क्षणिक सुख में पड़ कर अपने वीर्य का नाश कर देते हैं, और उसको साथ अपने को भी खोकर सितेज, निर्धन, निर्बल, सुदृष्ट और निर्बुद्धि होकर अपमृत्यु से थोड़े ही दिनों में मारे जाते हैं।
अब पाठक ओज और वीर्य के सम्बन्ध को समझ गये होंगे कि ब्रह्मचर्य से ही वे दोनों रक्षित रह कर दीर्घजीवन और सब सुख ग्रहण कर सकते हैं।