ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
पृष्ठ 237, कुल 380 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मचर्य-विज्ञान
२३४
नियत समय तक गृहस्थी में धर्म युक्त वीर्य के संरक्षण को क्यों न ब्रह्मचर्य कहा जाय ? जो स्त्रियाँ केवल अपने पति से वचित समय पर संसार के हित की इच्छा से सहवास कर गर्भ धारण करती हैं, वे भी ब्रह्मचारिणी हैं । ऐसी लियों की सन्तान सर्वदा सदगुणवाली होकर फलती-फूलती है ।
पुराणों में एक कथा महासती देवहूती की आई है । कदाचित् हमारी पाठिकयें भू इस नारी-रत्न का नाम सुन चुकी हों । ये प्रसिद्ध राजा स्वार्थसुख मनु की पुत्री थीं । इनका जिवाह कर्दम ऋषि से हुआ था । वे भी ज्ञान, विद्या, बुद्धि और धर्म में बड़े आदर्श पुरुष थे । देवहूती भी अत्यन्त सुशीला, परम विदुषी, धर्म-परायणा, सदाचारिणी एवं पतिव्रता स्त्री थीं । इन्हीं के कारण इनकी तीन सन्तानें संसार में सुप्रसिद्ध हुईं । अरुन्धती और अनुसूया नाम की दो पुत्रियाँ थीं, जिनमें पहली का विवाह महर्षि वशिष्ठ से और दूसरी का महासुनि अत्रि से हुआ था । एक पुत्र जिनका कि नाम कपिल सुनि था । ये अद्वितीय तत्त्वज्ञान साक्ष्य शास्त्र के आचार्य हुये ।
बहुत दिन तक गृहस्थाश्रम के सुखों का उपभोग कर लेने पर, कर्दम ऋषि ने तपस्या करने के लिये देवहूती से आहा-मंगी । उस समय उस देवी ने अपने भ्रिय पति को जाने की आहा दे दी । तत्पश्चात् वे स्वयं ब्रह्मचर्य-पालन और ब्रह्मज्ञान के चिन्तन में अपना समय बिताने लगीं । वे अपने पुत्र-से आध्यात्मिक विचारों को ग्रंथ द्वारा प्रकट कर, उनसे शङ्का-समाधान करती थीं । यह बात आज भी विख्यात है । यदि ऐसी आदर्श ब्रह्मचारिणी भावा न होती; तो हमें एक महात् तत्त्ववेत्ता की उपलब्धि न होती ।