ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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गृहस्थ ब्रह्मचारिणी देवहूती
उनकी इस बात से घृण्यी में एक स्थान हो गया और वे उसमें घृण्यी देवी के साथ लीन हो गईं।
अब पाठिकायें सीता के आदर्श ब्रह्मचर्य का परिचय भली भाँति पा गईं होंगी। उनमें कितनी आत्म-शक्ति, निर्भीकता और सत्यप्रियता थी। उनके कथन से कितना साहस और पति-प्रेम टपक रहा है। अतः सीता के उच्च चरित्र के पढ़ने का यही अभिप्राय है कि तुम भी उन्हीं की भाँति पतिव्रता बनने का उद्योग करो।
१२—गृहस्थ ब्रह्मचारिणी देवहूती
“भार्यामूलं शिवगौर्यं, भार्यामूलं तरिष्यतः।”
(महाभारत)
स्त्री धर्म, अर्थ और काम का मूल है। यह मोक्ष का भी साधन है।
“या नाशे पतिभक्ता स्यात्सत्वा सदा ब्रह्मचारिणी।”
(सृष्टि)
जो स्त्री केवल अपने पति से अनुराग रखती है, वह सर्वदा ब्रह्मचारिणी कहलाती है।
कुछ लोगों का मत है कि जिस स्त्री का विवाह हो गया, वह ब्रह्मचारिणी नहीं रह जाती। पर यह बात भ्रम-मूलक है। गृहस्थाश्रम में भी रहकर स्त्री-पुरुष ब्रह्मचर्य का पालन कर सकते हैं। मनु आदि धर्माचार्यों का कहना है कि नियमित सभ्य में सन्तान के लिये प्रेरित करना ब्रह्मचर्य है। फिर ऐसी अवस्था में एक
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