ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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व्यभिचारिणी की दुर्दशा
आज तक जितने सत्पुरुष उत्पन्न हुये हैं; वे सब सदाचारिणी माताओं के कारण ही हुये हैं । स्त्री-जाति का सुधार ही राष्ट्रीय सुधार समझना चाहिये । जो जाति उन्नत होना चाहती है, वह स्त्रियों में सदगुणों का पहले प्रचार करे ।
१४—व्यभिचारिणी की दुर्दशा
“व्यर्थिकारण शुक्रस्य, ब्रह्म-हत्यामवान्मुत्पत्ति ।”
( भविष्य-खण्ड )
युधा वीर्य का नाश करने से ब्रह्म-हत्या का पाप लगता है ।
“रजोदर्शनतः पूर्व, न स्त्री-संसर्गं माचरेत् ।”
( भविष्यपुराण )
रजोदर्शन होने से पहले स्त्री से समागम करना निषेध है ।
पुरुष-जाति में व्यभिचार तो बड़ा ही है, पर उनके प्रभाव से स्त्रियों में भी इस दोष का प्रचार हो रहा है । शास्त्रों के मत से अपने पति के साथ भी अनियमित मेलन करना भी व्यभिचार है, और इससे भी पाप होता है । सती स्त्रियाँ वे ही हैं, जो भिन्न समय पर सन्तान की इच्छा से पति का समागम करती हैं । अस्मय में सम्भोग-रत होने से पुरुष के वीर्य और स्त्री के रज का नाश होता है । वीर्य और रज के अधीन जीवन है । इसलिये दोनों को जीवन-हत्या का पातक होता है ।
जो स्त्रियाँ बाल्यावस्था से ही विषय-वासना में लग जाती हैं वे कभी सुख नहीं पातीं ।