ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
पृष्ठ 239, कुल 380 में से
संदर्भ में पढ़ेंग्रहार्च्य-विश्वास
२३६
स्वजीविकां धर्म-धनार्जनं पुनः, करोति निश्चितमथो हि भानवः ॥
जिसको छो पढ़ी-लिखी, सुशिक्षिता, गृह-कार्य तथा अन्य व्यवहारों में सुयोग्या होती है—वह पुरुष चिन्ता-रहित प्रसन्नमनः होकर अपने धर्म तथा धन का उपार्जन कर सकता है ।
काल के प्रभाव से अब खियों की प्राचीन मर्यादा का लोप हो रहा है। हिन्दू-जाति में अब खियों केवल पैर की पनही समझी जाने लगी हैं। उनकी शिक्षा-दीक्षा का प्रबन्ध ही दूर हो गया। पुरुष-जाति इनको पढ़ना-लिखाना एक अपमान और लज्जा की बात मानने लगा। इस प्रकार अयोग्य खियों की गृहस्थी के गुरुत्वर भार सौंपे जाने लगे और देश रसातल को पहुँच गया। खियों के इसी सम्बन्ध का एक हिन्दी कवि ने अपने पद्य में कैसा अच्छा चित्र खींचा है:—
सोचो ! नरों से नारियों किस बात में हैं कम हुईं । मध्यस्थ में शास्त्रार्थ में वे भारती के सम हुईं ॥ होती अनेकों रहीं गार्गी और मैत्रेयी जहाँ । हैं अब अविद्या-मूर्ति सी कुल-नारियों होती बहाँ ॥
(भारत-भारती )
जिस स्त्री-जाति ने शङ्कराचार्य और रामानुजाचार्य जैसे वेदान्ती—राणा प्रताप और शिवाजी जैसे शूर वीर—समर्थ रामदास, रामकृष्ण और सुरदास जैसे महात्मा—कालिदास, तुलसी दास और भूषण जैसे कवि, दयानन्द जैसे समाज सुधारक और सिलक तथा गान्धी जैसे देशसेवक उत्पन्न किये, उसकी दुर्दशा, किसे न असह्य जान पड़ेगी ?