ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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व्यभिचारिणी की दुर्दशा
आज तक जितने सत्पुरुष उत्पन्न हुये हैं; वे सब सदाचारिणी माताओं के कारण ही हुये हैं । स्त्री-जाति का सुधार ही राष्ट्रीय सुधार समझना चाहिये । जो जाति उन्नत होना चाहती है, वह स्त्रियों में सदगुणों का पहले प्रचार करे ।
१४—व्यभिचारिणी की दुर्दशा
“व्यर्थिकारण शुक्रस्य, ब्रह्म-हत्यामवान्मुत्पत्ति ।”
( भविष्य-खण्ड )
युधा वीर्य का नाश करने से ब्रह्म-हत्या का पाप लगता है ।
“रजोदर्शनतः पूर्व, न स्त्री-संसर्गं माचरेत् ।”
( भविष्यपुराण )
रजोदर्शन होने से पहले स्त्री से समागम करना निषेध है ।
पुरुष-जाति में व्यभिचार तो बड़ा ही है, पर उनके प्रभाव से स्त्रियों में भी इस दोष का प्रचार हो रहा है । शास्त्रों के मत से अपने पति के साथ भी अनियमित मेलन करना भी व्यभिचार है, और इससे भी पाप होता है । सती स्त्रियाँ वे ही हैं, जो भिन्न समय पर सन्तान की इच्छा से पति का समागम करती हैं । अस्मय में सम्भोग-रत होने से पुरुष के वीर्य और स्त्री के रज का नाश होता है । वीर्य और रज के अधीन जीवन है । इसलिये दोनों को जीवन-हत्या का पातक होता है ।
जो स्त्रियाँ बाल्यावस्था से ही विषय-वासना में लग जाती हैं वे कभी सुख नहीं पातीं ।
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स्त्रियों के दुराचारिणी होने से कुल, धर्म, जाति और देश का अधःपतन हो जाता है। जिस देश का नारी-समाज पतित होता है, वहाँ का पुरुष-समाज भी घुषित और अवनत स्वर्ग हो जाता है। यद्यपि स्त्रियों की दूषित करने का लाञ्छन पुरुषों पर ही लगाया जा सकता है, तथापि अज्ञानता के कारण स्त्रियाँ भी अपने नाश का कारण बन रही हैं।
हमने देखा है कि सधवा स्त्रियों की अपेक्षा विधवायें अधिक स्वस्थ और नीरोग रहती हैं। उनकी आयु भी बहुत बड़ी होती है और वे परिश्रम भी बहुत करती हैं। इसका प्रधान कारण हमें यही ज्ञात होता है कि उन्हें ब्रह्मचर्य-व्रत के पालन करने का अधिक अवसर मिलता है। पति के न रहने पर उनका जीवन संयमित और न्यभिचार रहित हो जाता है। ऐसा भी देखा गया है कि जो स्त्रियाँ अपने पति के जीवन-काल में बहुत अखस्थ रहती थीं, वे भी पति के मर जाने पर द्रष्टृ पृष्ट हो गई हैं।
अब हम स्त्रियों की उन दुर्बलताओं का वर्णन करते हैं, जो अति मैथुन तथा पापाचरण से उत्पन्न होती हैं:—
१—न्यभिचार से स्त्रियों का सौन्दर्य नष्ट हो जाता है।
२—युवावस्था में ही सब अङ्ग शिथिल हो जाते हैं।
३—बुद्धि, बल और गुणों का ह्रास होने लगता है।
४—गर्भ धारण करने की शक्ति नष्ट हो जाती है।
५—बहुत सी स्त्रियों के बालक नहीं होते, और होते भी हैं तो जीते नहीं।
६—राजयक्ष्मा, प्रदूर, रक्तवात-विकार, संयहृषी, शुल तथा अन्य प्राणनाशक रोग उत्पन्न हो जाते हैं।
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स्त्री-जाति पर विदेशी मत
७—हृदय में दुर्बलता, भोजन में अरुचि, भोग में आसक्ति, चित्त में अशान्ति तथा शयन में अनिद्रा हो जाती है ।
८—क्रोध, अतुल्लाह, अधैर्य, अविचार, अकार्य और लोभ बाला स्वभाव बन जाता है ।
९—जीवन भारतूप और दुःखमय जान पड़ने लगता है ।
१०—रोग पर रोग लगे रहते हैं, जिससे असमय में ही मृत्यु हो जाती है ।
आजकल प्रायः स्त्रियाँ इन दुर्दशाओं को भोग रही हैं । अत-एव यदि वे अपने को इनसे बचाना चाहें, तो अपने पत्नियों को भी सदाचारी बनायें और स्वयं सदाचारिणी बनने का उद्योग करें । यदि स्त्रियाँ चाहें, तो यह कोई उनके लिये बहुत कठिन काम नहीं है । धीरे-धीरे अभ्यास से अपने दोषों को निश्चय पूर्वक वे दूर कर सकती हैं ।
१५—स्त्री-जाति पर विदेशी मत
इस शीर्षक में हम उन विदेशी विद्वानों का मत उद्धृत करते हैं, जिन्होंने कि स्त्री-जाति के सम्बन्ध में बहुत विवेचना कर लेने पर ही अपना विचार प्रकट किया है :—
साध्वी स्त्री संसार के सब ऐश्वर्यों से वद्ध कर है । वह एक स्वर्गीय देवी है, जिसमें सम्पूर्ण दिव्य गुण निवास करते हैं ।
( जर्मनी टेडर )
संसार के आचार को बनाना, गृह का प्रबन्ध करना तथा
ग्रहचर्य-विज्ञान
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कोमलता, प्रेम, और सहन-शीलता से जीवन की कठिन और विषम यात्रा को सरल और सुखद बनाना खी का हा काम है ।
( टामसन )
इस संसार में खियों का राज्य है । ये ही माताओं, पुत्रियों और पत्नियों के रूप में इस जीवन के सङ्कल्पित मार्ग को विस्फुट बनाती हैं ।
( मांट गुमरी )
किसी देश की परम्परा और जाति-नियम कुछ भी हो, पर धर्म और सद्भाव की निष्पत्ति खियों के हाथ में होती है ।
ये देवियों हमारी पूजनीया हों या सहचरी नायिका हों या परिचारिका, इनका अखण्डनीय प्रभाव हम पर पड़ता है ।
( माटिन )
वह कौन सा आकाश है, जहाँ खी का प्रेम नहीं चढ़ता और वह कौन सा पाताल है, जहाँ वह नहीं डवरता ।
( कार्लिडन )
खी हमारे अधिध्यास और कठोरता से सुखे हृदय को प्रफुल्लित कर देती है । इन्हीं देवियों के प्रताप से नरक भी स्वर्ग बन जाता है ।
( लार्ड बाइरन )
मेरा जहाँ तक अनुभव है—मैं कह सकता हूँ कि सर्वत्र खियों कोमल-हृदया, दयाशीला, धर्म-परायणा और परोपकारिणी होती हैं । श्रद्धा, लज्जा और दया—ये तीन सहेलियाँ ती कभी इनका साथ नहीं छोड़तीं ।
( लिबार्ड )
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खी-जाति पर विदेशी भत
पुरुष को प्रसन्न रखने में खी की प्रसन्नता है। वह पुरुष की प्रसन्नता के लिये प्रायों को बलि तक दे सकती है।
( काउंटी पटमोर )
संसार-वाटिका में सती खी सबसे सुन्दर सुमन है। उसकी कोमलवा, उसकी सुगन्धि और रमणीयता—एक से एक बढ़ कर मनोहर है।
( थोकरे )
खी की सुन्दरता किस बात में हैं ? परोपकार और निश्छल भक्ति में तथा सन्तोष और सहनशीलता में—ये गुण उसके लावण्य को चमकाते, तेज को बढ़ाते तथा उसे देवता बनाते हैं।
( मिल्टन )
प्रसन्न मन और प्रसन्न वदन होना साहित्युत, सहास्रभूति, दुष्टि की सीमता, स्मृति की पीड़ता और दूसरे के मनको सहज में खींच लेना—इन गुणों में स्त्रियों अद्वितीय हैं।
( गबबोल )
देवियों के हृदय पर एक बार जो बात अङ्कित हो जाती है, उसका भिटाना फिर बड़ा कठिन हो जाता है।
( थेकरे )
इस बात को अपने मस्तिष्क से निकाल दो कि तुम स्त्रियों से गौरवशाली हो ! स्त्रियाँ तुम्हारी इच्छाओं और महत्वाकांक्षाओं की सङ्गिनी हैं। वे तुम्हारे सुख-दुःख में सहायता देती हैं।
( बेजिनी )
षडक्षरः रूपसु
१—ब्रह्म-चन्द्रना
ॐ यथा मधु मधुकृतः सम्भरन्ति मधावधि । एवा मे आश्विना वर्चं श्रामनि भ्रियताम् ॥
( भववैवेर )
जिस प्रकार से भ्रमर पुष्पों का रस लेकर मधु बनाता है और उसे मधु-चक्र में भरता है, उसी प्रकार हे सूर्य और चन्द्र रूपी परमात्मन् ! हमारे अन्तःकरण में भी तुम आत्म-वेज को प्रकाशित करो ।
तुम सूर्य और चन्द्र हो ! सूर्य से जगत् की जीवनी-शक्ति स्रष्टा और चन्द्र से शान्ति-दायिनी शीतलवा प्राप्त होती है । ब्रह्मचारी को इन दोनों की आवश्यकता होती है । तुम भ्रमर की भाँति सारतलों को ग्रहण करते हो । तुम्हारे पास अखिल सद्-गुण विद्यमान हैं, जिन के प्राप्त होने से ही आत्म-वेज प्रकट हो सकता है । हम इसी के लिये ब्रह्मचर्य की साधना करते हैं । हम भी मधुप बनना चाहते हैं । हमारी इच्छा है कि हम अपने शरीर में वीर्य को बढ़ाने का प्रयत्न करें । जैसे मधु के एकत्र करने से लोक को सुख पहुँचता है, उसी भाँति ब्रह्मचर्य के सिद्ध होने से सबः
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शरीर का सार
लोगों को मधुरता मिलती है। अतः हे प्रभो ! हमें वही ज्ञान दो जिससे हमारा व्रत पूर्ण हो। हम अपनी ही नहीं, संसार की सेवा के लिये ही यह वरदान माँग रहे हैं।
२—शरीर का सार
“शुकायत्तं चलं पुंसः।”
( वैश्वक )
वीर्य के अधीन मनुष्य का शारीरिक बल रहता है।
संसार के सभी पदार्थों में एक सार तत्व रहता है। उसके बल से ही वह सुरक्षित और मान्य होता है। सार तत्व के बिना किसी वस्तु की कभी स्थिति नहीं हो सकती। बड़े-बड़े वैज्ञानिकों का सिद्धान्त है कि एक भी पदार्थ सत्ता से हीन नहीं है। जब तक उसका अस्तित्व है, तब तक उसकी इस विरोध शक्ति का लोप नहीं हो सकता।
मनुष्य शरीर में भी एक सार तत्व है। उसी के रहने से वह अपना जीवन धारण कर सकता है। उसके बिना उसकी शारीरिक अवस्था एक क्षण भी नहीं चल सकती। लोग इस सार तत्व को 'वीर्य' कहते हैं। जो लोग बुद्धिमान हैं, वे यल-पूर्वक इसे अनुपम 'रत्न' समझ कर इसकी रक्षा करते हैं।
कुछ तत्वज्ञानियों का कहना है कि जब तक शरीर में वीर्य की स्थिति रहती है, तब तक मनुष्य मर नहीं सकता। वीर्य का नाश ही जीवन का नाश है। मृतक होने की दशा में वीर्य का
प्रसन्नचर्य-विधान
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पूर्वी रूप से क्षय हो जाता है। इस मत का अभिप्राय यह है कि वीर्य शरीर का वह अस्तित्व है, जिसके चल पर वह अपना कार्य सन्पादित कर सकता है।
हमारे वैश्वक-शास्त्र के आचार्यों ने इस वीर्य पर बहुत उत्तम विचार किया है। उन्होंने भी इसको सार-पदार्थ माना है। प्रायः सब ने इसकी रक्षा के लिये लाभप्रद उपदेश किये हैं।
वीर्य की रक्षा करने वालों का शरीर सुदृढ़, आत्मा सन्तुष्ट तथा मन प्रसन्न रहता है। वीर्यवान् पुरुष ही इस संसार में स्वस्थ शरीर और निर्भय चित्त रह सकते हैं। अतः मनुष्य-जाति का कर्तव्य है कि शरीर—रक्षा और सद्बुद्धि की सिद्धि के लिये इस अमृत रूपी वीर्य का सन्धन्य करे। भ्रम-वश कभी इसका नाश करने में तैयार न हो।
आहारस्य परं धाम, शुक्रं तद्व्यवमात्मनः।
क्षये यस्य बहून् योगान्मरणं वा नियच्छति ॥
( चरक-संहिता )
मनुष्य के भोजन का सब से उत्कृष्ट अंश वीर्य है। अतएव यज्ञ साहित उसकी रक्षा करनी चाहिये। क्योंकि वीर्य के क्षय होने से अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं और इसका अन्तिम परिणाम मरण भी है।
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वीर्य की उत्पत्ति:
३—वीर्य की उत्पत्ति
“शुक्रतेजो रेतसीच, वीज-वीर्येन्द्रियाणि च ।”
(अमर-कोष)
मनुष्य-शरीर में रहने वाले सार पदार्थ के इतने नाम हैं— शुक्र, तेज, रेतस्, वीज, वीर्य और इन्द्रिय ।
“वीर्यं सर्वाधिसावकम् ।”
वीर्य सध प्रकार के अर्थों का साधने वाला है ।
मनुष्य जो कुछ भोजन करता है, वह पहले पाकस्थली में जाकर रंजित होता है । आहार के पचने पर रसादि सात धातुयें कम से बनती हैं । आहार का अन्तिम और सर्वोत्तम परिणाम वीर्य है । यह अत्यन्त उपयोगी और जीवन तत्व वाला होता है । शरीर के लिये सातों धातुयें आवश्यक हैं । अतएव वैद्यक-शास्त्र के अनुसार हम उनका यहाँ पर वर्णन करते हैं ।
रसाद्रकं ततो माल्नें, मांसान्मैदः प्रजायते ।
मैदस्यास्थित्ततो मज्जा,मज्जायाः शुक्रसम्भवः॥
( शुश्रूषाचार्य )
भोजन के पचने पर रस, रस से रक्त, रक्त से मांस, मांस से मैद, मैद से अस्थि, अस्थि से मज्जा और मज्जा से वीर्य उत्पन्न होता है ।
इससे यह प्रकट है कि सप्तम धातु वीर्य है । यह मज्जा से उत्पन्न होता है । यही शरीर का जीवन और आधार है । अब पाठक समझ गये होंगे कि वीर्य कैसे बनता है और शारीरिक धातुओं में उसका कौन सा स्थान है ?
ऋग्वेद-विधान
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४—ओज और वीर्य
“ओजोऽस्योजो मयि येहि ।”
( यजुर्वेद )
हे परमेश्वर ! तुम जीवन-तत्व हो । अतः तुम हमें उसे प्रदान करो !
मनुष्य-शरीर जिस मूल शक्ति के कारण सजीव रहता है, उसका नाम वैद्यक-शास्त्र वालों ने ‘ओज’ रखा है । यह ओज देह की सम्पूर्ण धातुओं का सार और मानवी जीवन शक्ति का आधार है । उसके घटने से आयुर्वेद की दृष्टि और घटने से चीन्धता आती है । इस सम्बन्ध में आर्य वचन देखने योग्य हैः—
ओजस्तु तेजो धातूनां, शुक्लान्तानां परस्मैस्तु ।
यज्ञाशे नियतं नाथो, यस्मिंस्तिष्ठति जीवनम् ॥
( बृहद वामदेव )
ओज रस से लेकर-वीर्य-पर्यन्त धातुओं का तेल है, जिसके नष्ट होने पर कोई जीवित नहीं रह सकता । इसके रहने पर ही जीवन धारण किया जा सकता है ।
यह बात विदित हो गई कि ओज अमुकं तत्व है । अब यह प्रश्न होता है कि यह रहता किस स्थान पर है ? इस विषय में भी वैद्यक का मत इस प्रकार हैः—
“हृदयस्थमपि व्यापि, देहस्थिति निवन्धनम् ।”
वह ओज प्रधानसत्ता हृदय में रहता है, और वहीं से सब अङ्गों में पहुँचकर उनकी रक्षा करता है ।
वैद्यक-शास्त्र में ‘वीर्य’ की उपधातु को ‘ओज’ माना गया है । पर कुछ आचार्यों के मत से यह सात धातुओं से प्रथक् माना
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ओज और वीर्य
गया है। हमारे, मत से भी यह स्वतन्त्र और सर्व श्रेष्ठ तत्व है, जो वीर्य की शक्ति के रूप में सर्व शरीर में विद्यमान रहता है। अब हम इसका विशेष वर्णन भी यहाँ पर देते हैं:—
ओजः सर्वं शरीरस्थं, क्षिण्णं शीतं स्थिरं सितम् ।
सोमात्मकं शरीरस्थं, बलं पुष्टिं करं मतम् ॥
( योग-विन्तामणि )
ओज का निवास सब शरीर भर में है। यह चिकना, शीतल स्थिर, उज्ज्वल होता है। यह शरीर भर में तेज फैलाने वाला और बल-पुष्टि का बढ़ाने वाला है।
वातव्य में ऊपर का ओज ही जीवन तत्व है। यह वीर्य की अधिकता से बढ़ता और न्यूनता से घटता है। इसके अधीन शारीरिक और मानसिक समस्त शक्तियाँ मर्यादित होती हैं। ब्रह्मचर्य के पालन करने से ओज का नाश नहीं होता! ब्रह्मचारियों का ही शरीर ओज से परिपूर्ण रहता है, और वे ही हृष्ट-पुष्ट, सुन्दर, सहिष्णु, बली, विद्वान् विनम्र एवं शोभन् देखे जाते हैं। उनकी आगु भी ही वर्षा से कम की नहीं होती। न्यमिचारी पुरुष क्षणिक सुख में पड़ कर अपने वीर्य का नाश कर देते हैं, और उसको साथ अपने को भी खोकर सितेज, निर्धन, निर्बल, सुदृष्ट और निर्बुद्धि होकर अपमृत्यु से थोड़े ही दिनों में मारे जाते हैं।
अब पाठक ओज और वीर्य के सम्बन्ध को समझ गये होंगे कि ब्रह्मचर्य से ही वे दोनों रक्षित रह कर दीर्घजीवन और सब सुख ग्रहण कर सकते हैं।
ब्रह्मचर्य-विज्ञान
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५—वीर्य पर वैज्ञानिक दृष्टि
“अप्ताद्वेतः वेतसः पुरुषः ।”
(तैत्तिरीयोपनिषद्)।
अन्न से वीर्य और वीर्य से पुरुष उत्पन्न होता है ।
“शुक्रायच्छच्छ जीवितम् ।”
( भ. गी. )
मनुष्य का जीवन उसके वीर्य के अधीन है ।
पाश्चात्य देशवासी इस समय आविष्कार करने में भारतीयों से बहुत बढे-चढे हैं । उनके आविष्कार संसार में विशेष गौरव पा रहे हैं । जहाँ उन्होंने अनेक आविष्कार किये, वहाँ भला शरीर जैसे भौतिक पदार्थ के विषय में अन्वेषण न करते, तो कैसे बनता ! उन्होंने यह बात सिद्ध की है कि मानव-शरीर में असंख्य जीव हैं । वीर्य, रक्त और भल में भी अगणित जीवाणु होते हैं । इन्हीं जीवाणुओं की शक्ति से शक्ति, वृद्धता से वृद्धता और मृत्यु से मृत्यु होती है । एक विन्दु वीर्य में भी कोट्यधिक जीवाणु होते हैं । वीर्य-पात से शरीर के जीवाणुओं का नाश होता जाभा है, जिससे मनुष्य शीघ्र मरता है । यदि ब्रह्मचर्य से वीर्य की रक्षा की जाय, तो ये ही जीवाणु शरीर को बलशाली, कान्तिमाल और दीर्घायु बनाने का काम करते हैं ।
वैज्ञानिकों ने भी ब्रह्मचर्य को महत्व दिया है । उनका मत है कि जीवाणुमय वीर्य के संरक्षण से ही मनुष्य स्वस्थ और सुखी रह सकता है । न्यभिचारी पुरुष प्रायः अस्वस्थ और दुखी देखे
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वीर्य के पकने का काल
जाते हैं। इसका कारण यह है कि वे अपने वीर्य का नाश कर इस अवस्था को पहुँचते हैं।
हमारे मत से भी वैद्यानिकों का यह सिद्धान्त बहुत सत्य प्रतीत होता है। वीर्य में अवश्य जीवाणु हैं। इन्हीं के चल पर जीवन स्थिर है। इन्हीं के नष्ट हो जाने से लोग हव वीर्य और नपुंसक हो जाते हैं। इन्हीं के कारण सन्तानोत्पत्ति होती है।
अनो घसति सर्वसिन्धेहे तत्र विरोधतः।
वीर्य रक्त मले यस्मिन् चीरि याति क्षयं क्षणतः॥
(वैशक)
जीव देह में सब स्थानों में रहता है, पर वीर्य, रक्त और मल में विरोध रूप से बसता है, जिसके नष्ट होने से क्षय भर में मृत्यु का नाश हो जाता है।
६—वीर्य के पकने का काल
धातो रसदौ मरजान्ते, मृत्येकं कृमतो रसः।
अहो रात्रात्सर्वं पञ्च, सार्थं दण्डञ्च तिष्ठति॥
(महामान्य शोक)
रस से लेकर मज्जा तक मृत्येक धातु पाँच रात दिन और देह घड़ी तक अपनी अवस्था में रहती है। तदनन्तर वीर्य बनता है। अर्थात् ३० दिन-रात और ९ घड़ी में रस से वीर्य की वत्पत्ति होती है।
सभी चिकित्सकों का मत है कि एक मास के पश्चात् पुरुष-
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ग्रन्थचर्चा-विज्ञान
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शरीर में वीर्य तथा स्त्री शरीर में रज उत्पन्न होता है। इतने समय के पहले किसी के मत से वीर्य बनना नहीं सिद्ध होता।
हमारे प्राचीन आयुर्वेदाचार्य शुश्रुत के मत से भी वीर्य एक मास के पश्चात् बनता है:—
“पर्व मासेन रसः श्रुको भवति पुंसां स्त्रीयाश्चातीव मिति।” (शुश्रुत-संहिता)
इस प्रकार एक महीने में (छः धातुओं को पुष्ट करता हुआ) यह रस पुरुष के शरीर में वीर्य और स्त्री के शरीर में रज बन जाता है।
३० दिन के उपरान्त और ४० दिन के पूर्व अन्तिम धातु— वीर्य का बनना सर्व सम्मत है।
अब यह प्रश्न होता है कि यदि एक मास तक वीर्य नहीं बनता, तो इससे पहले सम्भोग करने से बाहर क्यों निकलता है ? इसका उत्तर यह है कि वीर्य का तो कभी शरीर में अभाव नहीं रहता। जिस दिन अभाव हो जाय, उसी दिन मनुष्य जी नहीं सकता।
प्रत्येक मनुष्य सदा भोजन करता है। जो कुछ आहार किया जाता है, उससे सदैव रसादि सातों धातुयें में क्रम से बनती रहती हैं। सातों धातुओं की सात प्रकार की क्रियायें निरन्तर होती हैं। इस नियम से वीर्य भी सदा बनता है, तो फिर ऊपर का मत मिथ्या है ? नहीं ! उसका अभिप्राय यह है कि निरन्तर बननेवाली धातु परिपक्व नहीं होती। जो धातु अविराम काम करती रहती है, वह एक मास के पश्चात् भली भाँति पक्व जाती है। एक मास के पश्चात् मनुष्य का वीर्य और स्त्री का रज भी सर्वज्ञों को पुष्ट करता हुआ, उचित अवस्था को पहुँच जाता है।
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वीर्य के पकने का काल
एक मास से पहले मैथुन का निषेध क्यों किया गया है ? वह इसीलिये कि इससे पहले वीर्य के बाहर निकलने से सब धातुओं में चीण्णा आ जाती है । धातुओं में चीण्णा आ जाने से, शरीर के सब अवयव निर्मल हो जाते हैं, और रोगों की वृत्तति होती है ।
हमारे विचार से एक मास के पश्चात् वीर्य का पकना अत्यन्त स्वाभाविक है । इसका प्रमाण यह है कि स्त्रियों का श्रद्धा-काल भी एक मास के पश्चात् ही आता है । यदि यह बात प्राकृतिक न होती, तो ऐसा क्यों होता ! परमात्मा ने स्त्रियों को गर्भ धारण करने के लिये तथा पुरुषों को गर्भाधान के लिये ही बनाया है । प्रधानतया मैथुन का भी उद्देश्य यही है ।
साधारणतया पुरुषों के वीर्य के पकने में एक मास का समय लगता है, पर इस निश्चित समय के कुछ पहले और पीछे भी ऐसा होता है, इसका प्रधान कारण शारीरिक बलायल सम्मंला चाहिये ।
बलवान मनुष्य के शरीर में आहार की रसादि क्रियायें शीघ्रता से होती रहती हैं । इसलिये उसका वीर्य भी कुछ पहले-ही पक जाता है, पर दुर्बल मनुष्य का वीर्य और भी अधिक दिन में पकता है । इसका कारण यह है कि उसके शरीर में आहार की रसादि क्रियायें देर में होती हैं । यही बात स्त्रियों के रज के सम्बन्ध में भी पूर्ण रीति से घटती है ।
अब हम एक मास के पश्चात् उत्पन्न होने वाले वीर्य तथा रज के कुछ सदृश गुण नीचे लिखते हैं—
१—एक मास के पश्चात् जो वीर्य या रज उत्पन्न होता है, वह अत्यन्त जीवन्ती-शक्ति से भरा हुआ होता है ।
ब्रह्मचर्य-विज्ञान
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२—ऐसे वीर्य तथा रज को गर्भोधान के अतिरिक्त किसी न्यर्थ सम्भोग में न व्यय करना चाहिये।
३—ऐसे अमूल्य वीर्य तथा रज की आवश्यकता न हो, तो शरीर से पृथक् न करना ही उत्तम है।
४—ऐसे वीर्य रज से कान्ति, आयु, शक्ति, बुद्धि, ज्ञान, सहिष्णुता, नीति, तेजस्विता तथा विनय-शीलता की वृद्धि होती है।
५—एक वर्ष के ब्रह्मचर्य से शरीर में अपरिमित वीर्य हो जाता है, जिससे की मनुष्य सब कुछ कर सकता है।
७—वीर्य का स्थान और परिमाण
शुक्ल सौम्यं सितं क्षिप्यं, बल पुष्टिकरं स्मृतम् । गर्भबीजं वपुः सारो, जीवस्याश्रयः स्मृतम् ॥
( वैश्व-गान् )
शुक्ल ( वीर्य ) जीवनी शक्ति का बढ़ाने वाला, श्वेत-वर्ण, चिकना बल तथा पुष्टि कारक होता है। यह गर्भ का बीज, शरीर का सार रूप तथा जीव का प्रधान आश्रय होता है।
वीर्य के स्थान और परिमाण के सम्बन्ध में बहुत से लोगों के मन में कुधारणार्थ उत्पन्न हो गई हैं। अतएव हम महर्षियों के लेख से दोनों बातों का निराकरण किये देते हैं।
यथा पयसि सर्पिस्तु, गृहश्वेत्तौ रसो यथा । प्रवं हि स्रकले काये, शुक्लं तिष्ठति देहिनाम् ॥
( वैश्व० )
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वीर्य का स्थान और परिमाण
जैसे दूध में घी और ईल में रस गुप्त रूप से ( दिखलाई नहीं पड़ता ) रहता है, उसी प्रकार प्राणियों के शरीर भर में वीर्य भी रहता है।
वास्तव में मनुष्य-शरीर में वीर्य के लिये कोई नियत स्थान नहीं है। यह सर्वत्र में व्याप्त है। जिस अन्त से वीर्य की सचा छू जाती है, वह शून्य हो जाता है। यदि वीर्य एक स्थान पर रहने वाला पदार्थ होता, तो इसके संरक्षण या नाश का मला-बुरा प्रभाव क्या सच अज्ञों पर न पड़ता ?
पृथक् स्वप्नसूक्तं प्रोक्तमोजोमस्तिभक्तैरत्नसाम् । द्वावरुजली तु स्तन्त्यस्य, चत्वारो रजसखियाः ॥
( बृहद वाग्भट्ट )
ओज, मस्तिष्क और वीर्य का मान पुरुष के अपने एक पसरा ( चुल्हा ) के बराबर होता है। और स्त्रियों के दूध का परिमाण दो अँजुली तथा रज का चार अँजुली है।
ऊपर दिया हुआ वीर्य और रज का परिमाण, स्वस्थ पुरुष और स्त्रियों का समझना चाहिये। अस्वस्थ पुरुष और स्त्रियों में रज का परिमाण इतना नहीं हो सकता।
कुछ लोगों का मत है कि ४० कवर आहार से १ बिन्दु रक्त और ४० बिन्दु रक्त से १ बिन्दु वीर्य उत्पन्न होता है।
हमारे देश के कुछ वैज्ञानिकों का अनुमान है कि १ तोला वीर्य के लिये १ सेर रक्त और १ सेर रक्त के लिये १ मन आहार की आवश्यकता होती है।
अब पाठक भली भाँति समझ गये होंगे कि वीर्य का प्रभाव
महात्म्य-विज्ञान
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सर्वाङ्ग पर होता है। वीर्य से ही सब इन्द्रियों में उचित शक्ति रहती है। वीर्य कितना अमूल्य पदार्थ है। यह कितने शत्रु से बनता तथा प्राप्त होता है। उसकी यदि अवहेलना की जाय, तो इससे बद्ध कर क्या मूर्खता होगी ? अतः जो लोग अपनी रक्षा चाहते हैं, वे सावधान हो कर मन, वचन तथा कर्म से अपने वीर्य की रक्षा करें।
८—सम्भोग से वीर्य-स्त्रवण
कृत्स्न देहस्थितं शुक्तं, प्रसन्न मनसस्तथा ।
स्त्रीपुत्रुषायच्छ्रुतश्चापि, हर्षात्तत्सम्प्रवर्तते ॥
( वैष्णक )
समस्त शरीर में रहने वाला वीर्य, प्रसन्न चित्त वाले पुरुष के स्त्री-सहवास से प्रवृत्त होता है। अर्थात् एकत्र होकर बाहर निकल जाता है। इसका कारण एक प्रकार का इन्द्रिय-सम्बन्धी आनन्द ( उद्रेक ) है। यही बात स्त्रियों के सम्बन्ध में भी घटती है। पुरुष के शारीरिक सम्बन्ध होने से उनका भी धातु-पात होता है।
वैष्णक-शास्त्र में लिखा है कि कामदेव के वेग से पुरुष और स्त्री के सम्भोग के कारण सारे शरीर में रहने वाला वीर्य, भीतरी अग्नि और वायु की प्रेरणा से एकत्र हो जाता है। वही हर्ष के व्यत्पन्न होने से अन्त में बाहर हो जाता है। जैसे दही के मध्यमें रहने से घी के कण इकट्ठे हो जाते हैं, और बिलोने से एक में
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वीर्य के कार्य
मिल कर वाहर आ जाते हैं, उसी प्रकार संघर्षण के कारण सब अङ्ग में रहने वाला वीर्य भी एकत्र हो कर निकल जाता है।
द्वधल्ले दक्षिण पार्श्व, वस्तिद्वारास्थ चाण्यधः।
मुञ्जस्रोतः पथे शुक्रं, पुरुषस्य प्रवर्तते ॥
दाहिने पंसवादि से दो अंगुल वस्ति-द्वार के नीचे, मूत्र के स्रोत के मार्ग से मनुष्य का वीर्य निकलता है।
रित्रियों का भी पुरुष के साथ सहवास से वीर्य-पात होता है, अन्यथा नहीं।
पुरुष-स्त्री का सम्भोग ही वास्तविक वीर्य-स्खलन का कारण होता है। इसके विरुद्ध जितने अन्य कार्य वीर्य के बाहर निकालने वाले हैं, अस्वाभाविक और हानि-कारक होते हैं। इस सम्भोग का भी विधान उचित समय के लिये ही किया गया है। अतः हम निवेदन करते हैं कि सम्भोग के अतिरिक्त वीर्यपात के कारणों से बचने का प्रत्येक पुरुष-स्त्री को प्रयत्न करना चाहिये। वह सम्भोग भी नियत तथा शाश्वत समय पर ही हितकर तथा आनन्द-वर्द्धक हो सकता है।
६—वीर्य के कार्य
यथा सहस्र ध्माते तु, न मलं किलं काञ्चने।
तथा रसे मुहुः पक्वे, न मलं शुक्रात् गते ॥
(वैश्वक)
जैसे सोने को सहस्र बार तपाने पर उसमें मल नहीं रह जाता, उसी प्रकार रस के कई बार पकते रहने पर, जब वीर्य बन
ब्रह्मचर्य-विज्ञान
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जाता है, तब उसमें फिर मल नहीं रहता। अर्थात् वीर्य के परचात् फिर कोई क्रिया रोप नहीं रहती।
हम पहले कह चुके हैं कि शरीर का सार वीर्य ही है। यही इसका आधार भी है। अतएव इसके कार्य भी बड़े महत्व के हैं। वे नीचे दिये जाते हैं:—
(१) वीर्य ही हृदय को पुष्ट तथा कर्तव्यशील बनाता है।
(२) वीर्य से ही सर्वाङ्ग में जीवनी-शक्ति सञ्चालित होती रहती है।
(३) वीर्य से ही मस्तिष्क शान्त और विचार-शक्ति-सम्पन्न रहता है।
(४) वीर्य से ही दृष्टि तथा श्रवण-शक्ति स्थिर रहती है।
(५) वीर्य से ही निर्भयता, स्वतन्त्रता, चत्ताह, साहस तथा पराक्रम आदि गुण बढ़ते हैं।
(६) वीर्य से ही आलस्य, रोग, निर्बलता, कलुषता, दुःख, अज्ञान तथा अविनय आदि दुर्गुण दूर किये जा सकते हैं।
(७) वीर्य के बिना सभी कार्य असिद्ध हो जाते हैं।
(८) वीर्य ही सन्तानोत्पत्ति का मूल है।
(९) वीर्य मनुष्य की सुन्दरता, सम्भ्यता, पवित्रता, धैर्य, पुरष तथा सद्व्यवहार का कारण है।
(१०) कहने का सारांश यह है कि शरीर में वीर्य ही सब कुछ कार्य करता है। इसकी हीनता से सारे व्यापार हीन हो जाते हैं।