भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ओज और वीर्य

गया है। हमारे, मत से भी यह स्वतन्त्र और सर्व श्रेष्ठ तत्व है, जो वीर्य की शक्ति के रूप में सर्व शरीर में विद्यमान रहता है। अब हम इसका विशेष वर्णन भी यहाँ पर देते हैं:—

ओजः सर्वं शरीरस्थं, क्षिण्णं शीतं स्थिरं सितम् ।

सोमात्मकं शरीरस्थं, बलं पुष्टिं करं मतम् ॥

( योग-विन्तामणि )

ओज का निवास सब शरीर भर में है। यह चिकना, शीतल स्थिर, उज्ज्वल होता है। यह शरीर भर में तेज फैलाने वाला और बल-पुष्टि का बढ़ाने वाला है।

वातव्य में ऊपर का ओज ही जीवन तत्व है। यह वीर्य की अधिकता से बढ़ता और न्यूनता से घटता है। इसके अधीन शारीरिक और मानसिक समस्त शक्तियाँ मर्यादित होती हैं। ब्रह्मचर्य के पालन करने से ओज का नाश नहीं होता! ब्रह्मचारियों का ही शरीर ओज से परिपूर्ण रहता है, और वे ही हृष्ट-पुष्ट, सुन्दर, सहिष्णु, बली, विद्वान् विनम्र एवं शोभन् देखे जाते हैं। उनकी आगु भी ही वर्षा से कम की नहीं होती। न्यमिचारी पुरुष क्षणिक सुख में पड़ कर अपने वीर्य का नाश कर देते हैं, और उसको साथ अपने को भी खोकर सितेज, निर्धन, निर्बल, सुदृष्ट और निर्बुद्धि होकर अपमृत्यु से थोड़े ही दिनों में मारे जाते हैं।

अब पाठक ओज और वीर्य के सम्बन्ध को समझ गये होंगे कि ब्रह्मचर्य से ही वे दोनों रक्षित रह कर दीर्घजीवन और सब सुख ग्रहण कर सकते हैं।