भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ऋग्वेद-विधान

२४६

४—ओज और वीर्य

“ओजोऽस्योजो मयि येहि ।”

( यजुर्वेद )

हे परमेश्वर ! तुम जीवन-तत्व हो । अतः तुम हमें उसे प्रदान करो !

मनुष्य-शरीर जिस मूल शक्ति के कारण सजीव रहता है, उसका नाम वैद्यक-शास्त्र वालों ने ‘ओज’ रखा है । यह ओज देह की सम्पूर्ण धातुओं का सार और मानवी जीवन शक्ति का आधार है । उसके घटने से आयुर्वेद की दृष्टि और घटने से चीन्धता आती है । इस सम्बन्ध में आर्य वचन देखने योग्य हैः—

ओजस्तु तेजो धातूनां, शुक्लान्तानां परस्मैस्तु ।

यज्ञाशे नियतं नाथो, यस्मिंस्तिष्ठति जीवनम् ॥

( बृहद वामदेव )

ओज रस से लेकर-वीर्य-पर्यन्त धातुओं का तेल है, जिसके नष्ट होने पर कोई जीवित नहीं रह सकता । इसके रहने पर ही जीवन धारण किया जा सकता है ।

यह बात विदित हो गई कि ओज अमुकं तत्व है । अब यह प्रश्न होता है कि यह रहता किस स्थान पर है ? इस विषय में भी वैद्यक का मत इस प्रकार हैः—

“हृदयस्थमपि व्यापि, देहस्थिति निवन्धनम् ।”

वह ओज प्रधानसत्ता हृदय में रहता है, और वहीं से सब अङ्गों में पहुँचकर उनकी रक्षा करता है ।

वैद्यक-शास्त्र में ‘वीर्य’ की उपधातु को ‘ओज’ माना गया है । पर कुछ आचार्यों के मत से यह सात धातुओं से प्रथक् माना