ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
पृष्ठ 248, कुल 380 में से
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वीर्य की उत्पत्ति:
३—वीर्य की उत्पत्ति
“शुक्रतेजो रेतसीच, वीज-वीर्येन्द्रियाणि च ।”
(अमर-कोष)
मनुष्य-शरीर में रहने वाले सार पदार्थ के इतने नाम हैं— शुक्र, तेज, रेतस्, वीज, वीर्य और इन्द्रिय ।
“वीर्यं सर्वाधिसावकम् ।”
वीर्य सध प्रकार के अर्थों का साधने वाला है ।
मनुष्य जो कुछ भोजन करता है, वह पहले पाकस्थली में जाकर रंजित होता है । आहार के पचने पर रसादि सात धातुयें कम से बनती हैं । आहार का अन्तिम और सर्वोत्तम परिणाम वीर्य है । यह अत्यन्त उपयोगी और जीवन तत्व वाला होता है । शरीर के लिये सातों धातुयें आवश्यक हैं । अतएव वैद्यक-शास्त्र के अनुसार हम उनका यहाँ पर वर्णन करते हैं ।
रसाद्रकं ततो माल्नें, मांसान्मैदः प्रजायते ।
मैदस्यास्थित्ततो मज्जा,मज्जायाः शुक्रसम्भवः॥
( शुश्रूषाचार्य )
भोजन के पचने पर रस, रस से रक्त, रक्त से मांस, मांस से मैद, मैद से अस्थि, अस्थि से मज्जा और मज्जा से वीर्य उत्पन्न होता है ।
इससे यह प्रकट है कि सप्तम धातु वीर्य है । यह मज्जा से उत्पन्न होता है । यही शरीर का जीवन और आधार है । अब पाठक समझ गये होंगे कि वीर्य कैसे बनता है और शारीरिक धातुओं में उसका कौन सा स्थान है ?