ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रसन्नचर्य-विधान
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पूर्वी रूप से क्षय हो जाता है। इस मत का अभिप्राय यह है कि वीर्य शरीर का वह अस्तित्व है, जिसके चल पर वह अपना कार्य सन्पादित कर सकता है।
हमारे वैश्वक-शास्त्र के आचार्यों ने इस वीर्य पर बहुत उत्तम विचार किया है। उन्होंने भी इसको सार-पदार्थ माना है। प्रायः सब ने इसकी रक्षा के लिये लाभप्रद उपदेश किये हैं।
वीर्य की रक्षा करने वालों का शरीर सुदृढ़, आत्मा सन्तुष्ट तथा मन प्रसन्न रहता है। वीर्यवान् पुरुष ही इस संसार में स्वस्थ शरीर और निर्भय चित्त रह सकते हैं। अतः मनुष्य-जाति का कर्तव्य है कि शरीर—रक्षा और सद्बुद्धि की सिद्धि के लिये इस अमृत रूपी वीर्य का सन्धन्य करे। भ्रम-वश कभी इसका नाश करने में तैयार न हो।
आहारस्य परं धाम, शुक्रं तद्व्यवमात्मनः।
क्षये यस्य बहून् योगान्मरणं वा नियच्छति ॥
( चरक-संहिता )
मनुष्य के भोजन का सब से उत्कृष्ट अंश वीर्य है। अतएव यज्ञ साहित उसकी रक्षा करनी चाहिये। क्योंकि वीर्य के क्षय होने से अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं और इसका अन्तिम परिणाम मरण भी है।