ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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शरीर का सार
लोगों को मधुरता मिलती है। अतः हे प्रभो ! हमें वही ज्ञान दो जिससे हमारा व्रत पूर्ण हो। हम अपनी ही नहीं, संसार की सेवा के लिये ही यह वरदान माँग रहे हैं।
२—शरीर का सार
“शुकायत्तं चलं पुंसः।”
( वैश्वक )
वीर्य के अधीन मनुष्य का शारीरिक बल रहता है।
संसार के सभी पदार्थों में एक सार तत्व रहता है। उसके बल से ही वह सुरक्षित और मान्य होता है। सार तत्व के बिना किसी वस्तु की कभी स्थिति नहीं हो सकती। बड़े-बड़े वैज्ञानिकों का सिद्धान्त है कि एक भी पदार्थ सत्ता से हीन नहीं है। जब तक उसका अस्तित्व है, तब तक उसकी इस विरोध शक्ति का लोप नहीं हो सकता।
मनुष्य शरीर में भी एक सार तत्व है। उसी के रहने से वह अपना जीवन धारण कर सकता है। उसके बिना उसकी शारीरिक अवस्था एक क्षण भी नहीं चल सकती। लोग इस सार तत्व को 'वीर्य' कहते हैं। जो लोग बुद्धिमान हैं, वे यल-पूर्वक इसे अनुपम 'रत्न' समझ कर इसकी रक्षा करते हैं।
कुछ तत्वज्ञानियों का कहना है कि जब तक शरीर में वीर्य की स्थिति रहती है, तब तक मनुष्य मर नहीं सकता। वीर्य का नाश ही जीवन का नाश है। मृतक होने की दशा में वीर्य का