भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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षडक्षरः रूपसु

१—ब्रह्म-चन्द्रना

ॐ यथा मधु मधुकृतः सम्भरन्ति मधावधि । एवा मे आश्विना वर्चं श्रामनि भ्रियताम् ॥

( भववैवेर )

जिस प्रकार से भ्रमर पुष्पों का रस लेकर मधु बनाता है और उसे मधु-चक्र में भरता है, उसी प्रकार हे सूर्य और चन्द्र रूपी परमात्मन् ! हमारे अन्तःकरण में भी तुम आत्म-वेज को प्रकाशित करो ।

तुम सूर्य और चन्द्र हो ! सूर्य से जगत् की जीवनी-शक्ति स्रष्टा और चन्द्र से शान्ति-दायिनी शीतलवा प्राप्त होती है । ब्रह्मचारी को इन दोनों की आवश्यकता होती है । तुम भ्रमर की भाँति सारतलों को ग्रहण करते हो । तुम्हारे पास अखिल सद्-गुण विद्यमान हैं, जिन के प्राप्त होने से ही आत्म-वेज प्रकट हो सकता है । हम इसी के लिये ब्रह्मचर्य की साधना करते हैं । हम भी मधुप बनना चाहते हैं । हमारी इच्छा है कि हम अपने शरीर में वीर्य को बढ़ाने का प्रयत्न करें । जैसे मधु के एकत्र करने से लोक को सुख पहुँचता है, उसी भाँति ब्रह्मचर्य के सिद्ध होने से सबः