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ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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शरीर का सार

लोगों को मधुरता मिलती है। अतः हे प्रभो ! हमें वही ज्ञान दो जिससे हमारा व्रत पूर्ण हो। हम अपनी ही नहीं, संसार की सेवा के लिये ही यह वरदान माँग रहे हैं।

२—शरीर का सार

“शुकायत्तं चलं पुंसः।”

( वैश्वक )

वीर्य के अधीन मनुष्य का शारीरिक बल रहता है।

संसार के सभी पदार्थों में एक सार तत्व रहता है। उसके बल से ही वह सुरक्षित और मान्य होता है। सार तत्व के बिना किसी वस्तु की कभी स्थिति नहीं हो सकती। बड़े-बड़े वैज्ञानिकों का सिद्धान्त है कि एक भी पदार्थ सत्ता से हीन नहीं है। जब तक उसका अस्तित्व है, तब तक उसकी इस विरोध शक्ति का लोप नहीं हो सकता।

मनुष्य शरीर में भी एक सार तत्व है। उसी के रहने से वह अपना जीवन धारण कर सकता है। उसके बिना उसकी शारीरिक अवस्था एक क्षण भी नहीं चल सकती। लोग इस सार तत्व को 'वीर्य' कहते हैं। जो लोग बुद्धिमान हैं, वे यल-पूर्वक इसे अनुपम 'रत्न' समझ कर इसकी रक्षा करते हैं।

कुछ तत्वज्ञानियों का कहना है कि जब तक शरीर में वीर्य की स्थिति रहती है, तब तक मनुष्य मर नहीं सकता। वीर्य का नाश ही जीवन का नाश है। मृतक होने की दशा में वीर्य का

प्रसन्नचर्य-विधान

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पूर्वी रूप से क्षय हो जाता है। इस मत का अभिप्राय यह है कि वीर्य शरीर का वह अस्तित्व है, जिसके चल पर वह अपना कार्य सन्पादित कर सकता है।

हमारे वैश्वक-शास्त्र के आचार्यों ने इस वीर्य पर बहुत उत्तम विचार किया है। उन्होंने भी इसको सार-पदार्थ माना है। प्रायः सब ने इसकी रक्षा के लिये लाभप्रद उपदेश किये हैं।

वीर्य की रक्षा करने वालों का शरीर सुदृढ़, आत्मा सन्तुष्ट तथा मन प्रसन्न रहता है। वीर्यवान् पुरुष ही इस संसार में स्वस्थ शरीर और निर्भय चित्त रह सकते हैं। अतः मनुष्य-जाति का कर्तव्य है कि शरीर—रक्षा और सद्बुद्धि की सिद्धि के लिये इस अमृत रूपी वीर्य का सन्धन्य करे। भ्रम-वश कभी इसका नाश करने में तैयार न हो।

आहारस्य परं धाम, शुक्रं तद्व्यवमात्मनः।

क्षये यस्य बहून् योगान्मरणं वा नियच्छति ॥

( चरक-संहिता )

मनुष्य के भोजन का सब से उत्कृष्ट अंश वीर्य है। अतएव यज्ञ साहित उसकी रक्षा करनी चाहिये। क्योंकि वीर्य के क्षय होने से अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं और इसका अन्तिम परिणाम मरण भी है।

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वीर्य की उत्पत्ति:

३—वीर्य की उत्पत्ति

“शुक्रतेजो रेतसीच, वीज-वीर्येन्द्रियाणि च ।”

(अमर-कोष)

मनुष्य-शरीर में रहने वाले सार पदार्थ के इतने नाम हैं— शुक्र, तेज, रेतस्, वीज, वीर्य और इन्द्रिय ।

“वीर्यं सर्वाधिसावकम् ।”

वीर्य सध प्रकार के अर्थों का साधने वाला है ।

मनुष्य जो कुछ भोजन करता है, वह पहले पाकस्थली में जाकर रंजित होता है । आहार के पचने पर रसादि सात धातुयें कम से बनती हैं । आहार का अन्तिम और सर्वोत्तम परिणाम वीर्य है । यह अत्यन्त उपयोगी और जीवन तत्व वाला होता है । शरीर के लिये सातों धातुयें आवश्यक हैं । अतएव वैद्यक-शास्त्र के अनुसार हम उनका यहाँ पर वर्णन करते हैं ।

रसाद्रकं ततो माल्नें, मांसान्मैदः प्रजायते ।

मैदस्यास्थित्ततो मज्जा,मज्जायाः शुक्रसम्भवः॥

( शुश्रूषाचार्य )

भोजन के पचने पर रस, रस से रक्त, रक्त से मांस, मांस से मैद, मैद से अस्थि, अस्थि से मज्जा और मज्जा से वीर्य उत्पन्न होता है ।

इससे यह प्रकट है कि सप्तम धातु वीर्य है । यह मज्जा से उत्पन्न होता है । यही शरीर का जीवन और आधार है । अब पाठक समझ गये होंगे कि वीर्य कैसे बनता है और शारीरिक धातुओं में उसका कौन सा स्थान है ?

ऋग्वेद-विधान

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४—ओज और वीर्य

“ओजोऽस्योजो मयि येहि ।”

( यजुर्वेद )

हे परमेश्वर ! तुम जीवन-तत्व हो । अतः तुम हमें उसे प्रदान करो !

मनुष्य-शरीर जिस मूल शक्ति के कारण सजीव रहता है, उसका नाम वैद्यक-शास्त्र वालों ने ‘ओज’ रखा है । यह ओज देह की सम्पूर्ण धातुओं का सार और मानवी जीवन शक्ति का आधार है । उसके घटने से आयुर्वेद की दृष्टि और घटने से चीन्धता आती है । इस सम्बन्ध में आर्य वचन देखने योग्य हैः—

ओजस्तु तेजो धातूनां, शुक्लान्तानां परस्मैस्तु ।

यज्ञाशे नियतं नाथो, यस्मिंस्तिष्ठति जीवनम् ॥

( बृहद वामदेव )

ओज रस से लेकर-वीर्य-पर्यन्त धातुओं का तेल है, जिसके नष्ट होने पर कोई जीवित नहीं रह सकता । इसके रहने पर ही जीवन धारण किया जा सकता है ।

यह बात विदित हो गई कि ओज अमुकं तत्व है । अब यह प्रश्न होता है कि यह रहता किस स्थान पर है ? इस विषय में भी वैद्यक का मत इस प्रकार हैः—

“हृदयस्थमपि व्यापि, देहस्थिति निवन्धनम् ।”

वह ओज प्रधानसत्ता हृदय में रहता है, और वहीं से सब अङ्गों में पहुँचकर उनकी रक्षा करता है ।

वैद्यक-शास्त्र में ‘वीर्य’ की उपधातु को ‘ओज’ माना गया है । पर कुछ आचार्यों के मत से यह सात धातुओं से प्रथक् माना

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ओज और वीर्य

गया है। हमारे, मत से भी यह स्वतन्त्र और सर्व श्रेष्ठ तत्व है, जो वीर्य की शक्ति के रूप में सर्व शरीर में विद्यमान रहता है। अब हम इसका विशेष वर्णन भी यहाँ पर देते हैं:—

ओजः सर्वं शरीरस्थं, क्षिण्णं शीतं स्थिरं सितम् ।

सोमात्मकं शरीरस्थं, बलं पुष्टिं करं मतम् ॥

( योग-विन्तामणि )

ओज का निवास सब शरीर भर में है। यह चिकना, शीतल स्थिर, उज्ज्वल होता है। यह शरीर भर में तेज फैलाने वाला और बल-पुष्टि का बढ़ाने वाला है।

वातव्य में ऊपर का ओज ही जीवन तत्व है। यह वीर्य की अधिकता से बढ़ता और न्यूनता से घटता है। इसके अधीन शारीरिक और मानसिक समस्त शक्तियाँ मर्यादित होती हैं। ब्रह्मचर्य के पालन करने से ओज का नाश नहीं होता! ब्रह्मचारियों का ही शरीर ओज से परिपूर्ण रहता है, और वे ही हृष्ट-पुष्ट, सुन्दर, सहिष्णु, बली, विद्वान् विनम्र एवं शोभन् देखे जाते हैं। उनकी आगु भी ही वर्षा से कम की नहीं होती। न्यमिचारी पुरुष क्षणिक सुख में पड़ कर अपने वीर्य का नाश कर देते हैं, और उसको साथ अपने को भी खोकर सितेज, निर्धन, निर्बल, सुदृष्ट और निर्बुद्धि होकर अपमृत्यु से थोड़े ही दिनों में मारे जाते हैं।

अब पाठक ओज और वीर्य के सम्बन्ध को समझ गये होंगे कि ब्रह्मचर्य से ही वे दोनों रक्षित रह कर दीर्घजीवन और सब सुख ग्रहण कर सकते हैं।

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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५—वीर्य पर वैज्ञानिक दृष्टि

“अप्ताद्वेतः वेतसः पुरुषः ।”

(तैत्तिरीयोपनिषद्)।

अन्न से वीर्य और वीर्य से पुरुष उत्पन्न होता है ।

“शुक्रायच्छच्छ जीवितम् ।”

( भ. गी. )

मनुष्य का जीवन उसके वीर्य के अधीन है ।

पाश्चात्य देशवासी इस समय आविष्कार करने में भारतीयों से बहुत बढे-चढे हैं । उनके आविष्कार संसार में विशेष गौरव पा रहे हैं । जहाँ उन्होंने अनेक आविष्कार किये, वहाँ भला शरीर जैसे भौतिक पदार्थ के विषय में अन्वेषण न करते, तो कैसे बनता ! उन्होंने यह बात सिद्ध की है कि मानव-शरीर में असंख्य जीव हैं । वीर्य, रक्त और भल में भी अगणित जीवाणु होते हैं । इन्हीं जीवाणुओं की शक्ति से शक्ति, वृद्धता से वृद्धता और मृत्यु से मृत्यु होती है । एक विन्दु वीर्य में भी कोट्यधिक जीवाणु होते हैं । वीर्य-पात से शरीर के जीवाणुओं का नाश होता जाभा है, जिससे मनुष्य शीघ्र मरता है । यदि ब्रह्मचर्य से वीर्य की रक्षा की जाय, तो ये ही जीवाणु शरीर को बलशाली, कान्तिमाल और दीर्घायु बनाने का काम करते हैं ।

वैज्ञानिकों ने भी ब्रह्मचर्य को महत्व दिया है । उनका मत है कि जीवाणुमय वीर्य के संरक्षण से ही मनुष्य स्वस्थ और सुखी रह सकता है । न्यभिचारी पुरुष प्रायः अस्वस्थ और दुखी देखे

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वीर्य के पकने का काल

जाते हैं। इसका कारण यह है कि वे अपने वीर्य का नाश कर इस अवस्था को पहुँचते हैं।

हमारे मत से भी वैद्यानिकों का यह सिद्धान्त बहुत सत्य प्रतीत होता है। वीर्य में अवश्य जीवाणु हैं। इन्हीं के चल पर जीवन स्थिर है। इन्हीं के नष्ट हो जाने से लोग हव वीर्य और नपुंसक हो जाते हैं। इन्हीं के कारण सन्तानोत्पत्ति होती है।

अनो घसति सर्वसिन्धेहे तत्र विरोधतः।

वीर्य रक्त मले यस्मिन् चीरि याति क्षयं क्षणतः॥

(वैशक)

जीव देह में सब स्थानों में रहता है, पर वीर्य, रक्त और मल में विरोध रूप से बसता है, जिसके नष्ट होने से क्षय भर में मृत्यु का नाश हो जाता है।

६—वीर्य के पकने का काल

धातो रसदौ मरजान्ते, मृत्येकं कृमतो रसः।

अहो रात्रात्सर्वं पञ्च, सार्थं दण्डञ्च तिष्ठति॥

(महामान्य शोक)

रस से लेकर मज्जा तक मृत्येक धातु पाँच रात दिन और देह घड़ी तक अपनी अवस्था में रहती है। तदनन्तर वीर्य बनता है। अर्थात् ३० दिन-रात और ९ घड़ी में रस से वीर्य की वत्पत्ति होती है।

सभी चिकित्सकों का मत है कि एक मास के पश्चात् पुरुष-

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ग्रन्थचर्चा-विज्ञान

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शरीर में वीर्य तथा स्त्री शरीर में रज उत्पन्न होता है। इतने समय के पहले किसी के मत से वीर्य बनना नहीं सिद्ध होता।

हमारे प्राचीन आयुर्वेदाचार्य शुश्रुत के मत से भी वीर्य एक मास के पश्चात् बनता है:—

“पर्व मासेन रसः श्रुको भवति पुंसां स्त्रीयाश्चातीव मिति।” (शुश्रुत-संहिता)

इस प्रकार एक महीने में (छः धातुओं को पुष्ट करता हुआ) यह रस पुरुष के शरीर में वीर्य और स्त्री के शरीर में रज बन जाता है।

३० दिन के उपरान्त और ४० दिन के पूर्व अन्तिम धातु— वीर्य का बनना सर्व सम्मत है।

अब यह प्रश्न होता है कि यदि एक मास तक वीर्य नहीं बनता, तो इससे पहले सम्भोग करने से बाहर क्यों निकलता है ? इसका उत्तर यह है कि वीर्य का तो कभी शरीर में अभाव नहीं रहता। जिस दिन अभाव हो जाय, उसी दिन मनुष्य जी नहीं सकता।

प्रत्येक मनुष्य सदा भोजन करता है। जो कुछ आहार किया जाता है, उससे सदैव रसादि सातों धातुयें में क्रम से बनती रहती हैं। सातों धातुओं की सात प्रकार की क्रियायें निरन्तर होती हैं। इस नियम से वीर्य भी सदा बनता है, तो फिर ऊपर का मत मिथ्या है ? नहीं ! उसका अभिप्राय यह है कि निरन्तर बननेवाली धातु परिपक्व नहीं होती। जो धातु अविराम काम करती रहती है, वह एक मास के पश्चात् भली भाँति पक्व जाती है। एक मास के पश्चात् मनुष्य का वीर्य और स्त्री का रज भी सर्वज्ञों को पुष्ट करता हुआ, उचित अवस्था को पहुँच जाता है।

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वीर्य के पकने का काल

एक मास से पहले मैथुन का निषेध क्यों किया गया है ? वह इसीलिये कि इससे पहले वीर्य के बाहर निकलने से सब धातुओं में चीण्णा आ जाती है । धातुओं में चीण्णा आ जाने से, शरीर के सब अवयव निर्मल हो जाते हैं, और रोगों की वृत्तति होती है ।

हमारे विचार से एक मास के पश्चात् वीर्य का पकना अत्यन्त स्वाभाविक है । इसका प्रमाण यह है कि स्त्रियों का श्रद्धा-काल भी एक मास के पश्चात् ही आता है । यदि यह बात प्राकृतिक न होती, तो ऐसा क्यों होता ! परमात्मा ने स्त्रियों को गर्भ धारण करने के लिये तथा पुरुषों को गर्भाधान के लिये ही बनाया है । प्रधानतया मैथुन का भी उद्देश्य यही है ।

साधारणतया पुरुषों के वीर्य के पकने में एक मास का समय लगता है, पर इस निश्चित समय के कुछ पहले और पीछे भी ऐसा होता है, इसका प्रधान कारण शारीरिक बलायल सम्मंला चाहिये ।

बलवान मनुष्य के शरीर में आहार की रसादि क्रियायें शीघ्रता से होती रहती हैं । इसलिये उसका वीर्य भी कुछ पहले-ही पक जाता है, पर दुर्बल मनुष्य का वीर्य और भी अधिक दिन में पकता है । इसका कारण यह है कि उसके शरीर में आहार की रसादि क्रियायें देर में होती हैं । यही बात स्त्रियों के रज के सम्बन्ध में भी पूर्ण रीति से घटती है ।

अब हम एक मास के पश्चात् उत्पन्न होने वाले वीर्य तथा रज के कुछ सदृश गुण नीचे लिखते हैं—

१—एक मास के पश्चात् जो वीर्य या रज उत्पन्न होता है, वह अत्यन्त जीवन्ती-शक्ति से भरा हुआ होता है ।

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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२—ऐसे वीर्य तथा रज को गर्भोधान के अतिरिक्त किसी न्यर्थ सम्भोग में न व्यय करना चाहिये।

३—ऐसे अमूल्य वीर्य तथा रज की आवश्यकता न हो, तो शरीर से पृथक् न करना ही उत्तम है।

४—ऐसे वीर्य रज से कान्ति, आयु, शक्ति, बुद्धि, ज्ञान, सहिष्णुता, नीति, तेजस्विता तथा विनय-शीलता की वृद्धि होती है।

५—एक वर्ष के ब्रह्मचर्य से शरीर में अपरिमित वीर्य हो जाता है, जिससे की मनुष्य सब कुछ कर सकता है।

७—वीर्य का स्थान और परिमाण

शुक्ल सौम्यं सितं क्षिप्यं, बल पुष्टिकरं स्मृतम् । गर्भबीजं वपुः सारो, जीवस्याश्रयः स्मृतम् ॥

( वैश्व-गान् )

शुक्ल ( वीर्य ) जीवनी शक्ति का बढ़ाने वाला, श्वेत-वर्ण, चिकना बल तथा पुष्टि कारक होता है। यह गर्भ का बीज, शरीर का सार रूप तथा जीव का प्रधान आश्रय होता है।

वीर्य के स्थान और परिमाण के सम्बन्ध में बहुत से लोगों के मन में कुधारणार्थ उत्पन्न हो गई हैं। अतएव हम महर्षियों के लेख से दोनों बातों का निराकरण किये देते हैं।

यथा पयसि सर्पिस्तु, गृहश्वेत्तौ रसो यथा । प्रवं हि स्रकले काये, शुक्लं तिष्ठति देहिनाम् ॥

( वैश्व० )

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वीर्य का स्थान और परिमाण

जैसे दूध में घी और ईल में रस गुप्त रूप से ( दिखलाई नहीं पड़ता ) रहता है, उसी प्रकार प्राणियों के शरीर भर में वीर्य भी रहता है।

वास्तव में मनुष्य-शरीर में वीर्य के लिये कोई नियत स्थान नहीं है। यह सर्वत्र में व्याप्त है। जिस अन्त से वीर्य की सचा छू जाती है, वह शून्य हो जाता है। यदि वीर्य एक स्थान पर रहने वाला पदार्थ होता, तो इसके संरक्षण या नाश का मला-बुरा प्रभाव क्या सच अज्ञों पर न पड़ता ?

पृथक् स्वप्नसूक्तं प्रोक्तमोजोमस्तिभक्तैरत्नसाम् । द्वावरुजली तु स्तन्त्यस्य, चत्वारो रजसखियाः ॥

( बृहद वाग्भट्ट )

ओज, मस्तिष्क और वीर्य का मान पुरुष के अपने एक पसरा ( चुल्हा ) के बराबर होता है। और स्त्रियों के दूध का परिमाण दो अँजुली तथा रज का चार अँजुली है।

ऊपर दिया हुआ वीर्य और रज का परिमाण, स्वस्थ पुरुष और स्त्रियों का समझना चाहिये। अस्वस्थ पुरुष और स्त्रियों में रज का परिमाण इतना नहीं हो सकता।

कुछ लोगों का मत है कि ४० कवर आहार से १ बिन्दु रक्त और ४० बिन्दु रक्त से १ बिन्दु वीर्य उत्पन्न होता है।

हमारे देश के कुछ वैज्ञानिकों का अनुमान है कि १ तोला वीर्य के लिये १ सेर रक्त और १ सेर रक्त के लिये १ मन आहार की आवश्यकता होती है।

अब पाठक भली भाँति समझ गये होंगे कि वीर्य का प्रभाव

महात्म्य-विज्ञान

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सर्वाङ्ग पर होता है। वीर्य से ही सब इन्द्रियों में उचित शक्ति रहती है। वीर्य कितना अमूल्य पदार्थ है। यह कितने शत्रु से बनता तथा प्राप्त होता है। उसकी यदि अवहेलना की जाय, तो इससे बद्ध कर क्या मूर्खता होगी ? अतः जो लोग अपनी रक्षा चाहते हैं, वे सावधान हो कर मन, वचन तथा कर्म से अपने वीर्य की रक्षा करें।

८—सम्भोग से वीर्य-स्त्रवण

कृत्स्न देहस्थितं शुक्तं, प्रसन्न मनसस्तथा ।

स्त्रीपुत्रुषायच्छ्रुतश्चापि, हर्षात्तत्सम्प्रवर्तते ॥

( वैष्णक )

समस्त शरीर में रहने वाला वीर्य, प्रसन्न चित्त वाले पुरुष के स्त्री-सहवास से प्रवृत्त होता है। अर्थात् एकत्र होकर बाहर निकल जाता है। इसका कारण एक प्रकार का इन्द्रिय-सम्बन्धी आनन्द ( उद्रेक ) है। यही बात स्त्रियों के सम्बन्ध में भी घटती है। पुरुष के शारीरिक सम्बन्ध होने से उनका भी धातु-पात होता है।

वैष्णक-शास्त्र में लिखा है कि कामदेव के वेग से पुरुष और स्त्री के सम्भोग के कारण सारे शरीर में रहने वाला वीर्य, भीतरी अग्नि और वायु की प्रेरणा से एकत्र हो जाता है। वही हर्ष के व्यत्पन्न होने से अन्त में बाहर हो जाता है। जैसे दही के मध्यमें रहने से घी के कण इकट्ठे हो जाते हैं, और बिलोने से एक में

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वीर्य के कार्य

मिल कर वाहर आ जाते हैं, उसी प्रकार संघर्षण के कारण सब अङ्ग में रहने वाला वीर्य भी एकत्र हो कर निकल जाता है।

द्वधल्ले दक्षिण पार्श्व, वस्तिद्वारास्थ चाण्यधः।

मुञ्जस्रोतः पथे शुक्रं, पुरुषस्य प्रवर्तते ॥

दाहिने पंसवादि से दो अंगुल वस्ति-द्वार के नीचे, मूत्र के स्रोत के मार्ग से मनुष्य का वीर्य निकलता है।

रित्रियों का भी पुरुष के साथ सहवास से वीर्य-पात होता है, अन्यथा नहीं।

पुरुष-स्त्री का सम्भोग ही वास्तविक वीर्य-स्खलन का कारण होता है। इसके विरुद्ध जितने अन्य कार्य वीर्य के बाहर निकालने वाले हैं, अस्वाभाविक और हानि-कारक होते हैं। इस सम्भोग का भी विधान उचित समय के लिये ही किया गया है। अतः हम निवेदन करते हैं कि सम्भोग के अतिरिक्त वीर्यपात के कारणों से बचने का प्रत्येक पुरुष-स्त्री को प्रयत्न करना चाहिये। वह सम्भोग भी नियत तथा शाश्वत समय पर ही हितकर तथा आनन्द-वर्द्धक हो सकता है।

६—वीर्य के कार्य

यथा सहस्र ध्माते तु, न मलं किलं काञ्चने।

तथा रसे मुहुः पक्वे, न मलं शुक्रात् गते ॥

(वैश्वक)

जैसे सोने को सहस्र बार तपाने पर उसमें मल नहीं रह जाता, उसी प्रकार रस के कई बार पकते रहने पर, जब वीर्य बन

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जाता है, तब उसमें फिर मल नहीं रहता। अर्थात् वीर्य के परचात् फिर कोई क्रिया रोप नहीं रहती।

हम पहले कह चुके हैं कि शरीर का सार वीर्य ही है। यही इसका आधार भी है। अतएव इसके कार्य भी बड़े महत्व के हैं। वे नीचे दिये जाते हैं:—

(१) वीर्य ही हृदय को पुष्ट तथा कर्तव्यशील बनाता है।

(२) वीर्य से ही सर्वाङ्ग में जीवनी-शक्ति सञ्चालित होती रहती है।

(३) वीर्य से ही मस्तिष्क शान्त और विचार-शक्ति-सम्पन्न रहता है।

(४) वीर्य से ही दृष्टि तथा श्रवण-शक्ति स्थिर रहती है।

(५) वीर्य से ही निर्भयता, स्वतन्त्रता, चत्ताह, साहस तथा पराक्रम आदि गुण बढ़ते हैं।

(६) वीर्य से ही आलस्य, रोग, निर्बलता, कलुषता, दुःख, अज्ञान तथा अविनय आदि दुर्गुण दूर किये जा सकते हैं।

(७) वीर्य के बिना सभी कार्य असिद्ध हो जाते हैं।

(८) वीर्य ही सन्तानोत्पत्ति का मूल है।

(९) वीर्य मनुष्य की सुन्दरता, सम्भ्यता, पवित्रता, धैर्य, पुरष तथा सद्व्यवहार का कारण है।

(१०) कहने का सारांश यह है कि शरीर में वीर्य ही सब कुछ कार्य करता है। इसकी हीनता से सारे व्यापार हीन हो जाते हैं।

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जरा और मृत्यु

१०—जरा और मृत्यु

“मा पुत्रा जररतो मृयाः ।”

( अथर्ववेद )

हे जीव ! तू वृद्धता से पूर्ण मत मर ।

“वृद्धत्वे जीवन-न्ययम् ।”

वृद्धता के आने पर ही आगुर्वल का नाश होता है ।

आज कल भी मनुष्य के मरने की अवस्था वृद्धता मानी गई है । जो लोग वृद्धता से पहले अपनी ऐहिक लीला समाप्त कर देते हैं, उनके लिये लोग बहुत शोक करते हैं, पर इस बात पर जरा भी ध्यान नहीं देते कि किस कारण से उसकी झकास मृत्यु हुई । प्राचीन काल में वृद्धता से पहले लोग मरते ही नहीं थे । जिसके राज्य में कोई बालक या युवा मर जाता था, वह राजा अचरमी समझा जाता था । श्रीराम के राजत्व में एक ब्राह्मण का युवा पुत्र मर गया, सो उस ब्राह्मण को बड़ा आश्चर्य हो गया था । उस समय की और आज की परिस्थिति में आकाश-पातल का अन्तर हो गया है । सौ में एकाध पुनः ही अपना वृद्धता को प्राप्त कर सकते हैं । शेष नित्यानन्द लोग बाल्य और युवावस्था में ही इस संसार से चल बसते हैं ।

इस दुःखमयी वार्ता का एक मात्र कारण ब्रह्मचर्य का अभाव है । जब तक इस देश में ब्रह्मचर्य का सुधार तथा प्रचार नहीं होता, तब तक इसका रोकना सम्भव नहीं ।

मनुष्य-शरीर की तीन अवस्थायें मानी गई हैं । बाल्य, और युवा के पश्चात् वृद्धावस्था होती है । इसलिये इस समय से पहले मरना पाप का कारण समझना चाहिये । अपने धीर्य की

ब्रह्मचर्य-विमान

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२३वा करने वाला पुरुष इससे पहले कभी भर नहीं सकता ! इस कथन को हम सुवर्ण के पत्र पर निर्भयता से लिंक सकते हैं ।

शारीर के सम्बन्ध में विशेष अनुभव की बात कहने वास ग्रन्थ आयुर्वेद माना जाता है । उसकी भी सम्मति है कि मनुष्य का जीवन उसके शारीरिक-गठन पर निर्भर करता है । आयुर्विज्ञान के प्राचीन आचार्यों ने बहुत कुछ इस सम्बन्ध में अनुसन्धान किया है । उनकी बातें कभी भूटी नहीं हो सकतीं ।

पर आज तो अवस्था उसके विपरीत है । ऐसा क्यों हुआ ! दिन पर दिन ब्रह्मचर्य का लोप होता गया । विलासिता और व्यभिचार के कारण मनुष्य-जाति अपने ईश्वर-दूत दीर्घ-जीवन रूप अधिकारों को खोती गई और वह इतनी पतित होती जा रही है कि अपना आयुर्वेद रखते हुये भी अकाल मृत्यु के मुख में पड़ रही है । अतः हम चल पूर्वक इस बात को कहते हैं कि यदि मानव-जाति पुनः अपना पत्थन करना चाहती है—फिर भी वह अपने आयुर्वेद की प्राचीन वैद्यक कथितोक्त मर्यादा बौधन चाहे, तो ब्रह्मचर्य की प्रणाली के प्रचार और विधिवत सुधार में देर न लगावे ।

हमें पूरा विश्वास है कि १२० वर्ष के आयुर्भोग के लिये हमारी आश्रम-प्रणाली ही पर्याप्त होगी । इससे अधिक भी दीर्घ-जीवन प्राप्त किया जा सकता है, पर वह योगाभ्यास की क्रिया के अधीन है !

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आयुर्वेद का कारण

११—आयुर्वेद का कारण

हृदय चेतनास्थान भोजसन्ध्याश्रयं मतम् । शरीर प्राणयोरैर्व, संयोगादायुक्त्येत ।

( शार्द्वर-संहिता )

हृदय चेतनता का स्थान और ओज का आश्रय-ज्ञाता है । इस प्रकार शरीर और प्राण के संयोग का नाम 'आयु' है ।

मनुष्य-शरीर में हृदय एक बहुत ही उत्तम तथा आवश्यक पदार्थ है । महर्षियों का मत है कि गर्भ में भी पहले पहले इसका आढुआव होता है ।

चेतन तथा ओज का भी यही स्थान है । यहाँ से रक्त का सञ्चालन और शुद्धीकरण होता है । प्राणों का भी इससे वनिष्ठ सम्बन्ध है । जिस हृदय का हम इस प्रकार वर्णन कर रहे हैं, वही आयु का भी कारण है । जिसका हृदय निर्वल हो जाता है, वह बहुत कम दिनों तक जीती है । इसलिये हृदय की पुष्टता आयु के लिये विशेष आवश्यक होना है । अतएव 'हम हृदय के पुष्ट रखने के लिये कुछ प्रधान बातें बतलाना चाहते हैं'—

( १ ) वीर्य-रत्ना से ही हृदय पुष्ट तथा कार्यकारी बन सकता है ।

( २ ) माषायाम से वीर्य-रत्ना हो सकती है और हृदय स्वस्थ रह सकता है ।

( ३ ) व्यायाम से हृदय की शक्ति बढ़ती रहती है ।

( ४ ) उत्तम आहार से वीर्य बनता है और हृदय बलवान होता है ।

अहर्चार्य-विज्ञान

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(५) नीरोग रहने से हृदय कभी चीखा नहीं होता। ऊपर लिखी हुई बातों से हृदय चलिष्ट और हर्षित रहता है। और यही हृदय आयु का कारण है। इसलिये जो लोग आयु के इच्छुक हों, वे अपने हृदय की रक्षा करते रहें। ऐसे कार्य न करें, जिससे कि उनका हृदय निर्बल हो जाय !

१२—वीर्य-च्य से राजरोग

“नष्टे शुक्ले सर्वे रोगा भवन्ति।”

(सूक्त)

वीर्य के अभाव में अनेक रोग उत्पन्न होते हैं।

यह बात बहुत सत्य है कि जिसके शरीर में वीर्य की कमी हो जाती है, उसके शरीर में नाना प्रकार के रोग घर कर लेते हैं। वीर्य-नाश से जिन महा रोगों की उत्पत्ति होती है, हम उनमें से कुछ प्रधान रोगों का यहाँ संक्षिप्त रूप से वर्णन कर देना चाहते हैं:—

(१) प्रमेह

जब मनुष्य का वीर्य विगड़ कर स्पर्श शरीर से किसी न किसी रूप में बाहर निकलने लगता है, तब उसे ‘प्रमेह’ कहते हैं।

प्रमेह का नाम लेते ही एक घार हृदय घड़कने लगता है। यह अत्यन्त भयङ्कर और भारत-व्यापी रोग है। वैद्यक-शास्त्र में जन्म के छेत्र से यह २० प्रकार का माना गया है। इसकी अन्तिम

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वीर्य-ज्ञय से राज रोग

अवस्था में प्राणों का नाश हो जाता है । इसके उत्पन्न होने के निम्नलिखित कारण बतलाये गये हैं :—

अधिक वीर्य नष्ट करने से—कुसमय में सम्भोग करने से—प्रकृति-विरुद्ध कार्य करने से—नया पान, गुड़, दही, दूध, तैल, मिर्ची और खट्वाई आदि अधिक खाने से—विशेष मछली-मांस के सेवन से तथा कफ-वर्द्धक पदार्थों के खाने से प्रमेह रोग उत्पन्न होता है । सब प्रकार के प्रमेह चिरस्थायी नहीं होते, पर वीर्य-ज्ञय से जो उत्पन्न होता है, वही हानिकारक होता है ।

आजकल प्रायः १५ सैकड़े लोग इस प्राण-विनाशक रोग के हाथ में पड़े हुये हैं । बहुत से लोग ऊपर से देखने में बड़े दृष्ट-पुष्ट दीखते हैं, पर भीतर ही भीतर उनमें प्रमेह बढ़ता रहता है । पहले तो इसका लोगों को ज्ञान नहीं होता, पर जब यह प्रवल हो जाता है, तब लोगों को इसकी चिन्ता व्यापती है । यदि अच्छे चिकित्सक से काम पड़ा और उसके कहने के अनुकूल संयम किया गया, तब तो कुछ आशा होती है, नहीं तो भरकर ही मनुष्य को इससे मुक्ति होती है ।

प्रमेह में सर्वाङ्ग का वीर्य मूत्र के साथ अनिच्छापूर्वक बाहर निकलाने लगता है । जब यह अधिकघट जाता है, उस अवस्था में सब धातु इसी के साथ गल-गल कर शरीर के बाहर हो जाती हैं । वह मनुष्य निस्तेज, दुर्बल, पीला, अज्ञानी, डन्मादी और चिड़चिड़ा हो जाता है । उसे भोजन नहीं पचता, दस्त ठीक नहीं होती—निद्रा अच्छी तरह से नहीं आती और मस्तिष्क में सौंय-सौंय शब्द होते रहते हैं । ज़मेही पुरुष मरण से बढ़कर कष्ट सहता हुआ योद्धे ही दिनों में काल का प्राप्त बनता है ।

प्राप्तचर्य-विधान

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(२) च्युत या यच्छा

इसमें शरीर के बारे दोष प्रकृत होकर नष्ट होने लगते हैं और हृदय और कुण्डल अस्मत्त हो जाते हैं । इसी को 'च्युत' कहते हैं । च्युत या यच्छा भी प्रसूत की शक्ति घटा भयानक संक्रामक रोग है । अनेक नवयुवक इसके कारण अपने प्राणों को असमय में खो बैठते हैं ।

इसके प्रारम्भ होने के भी कई कारण हैं, पर सर्व-प्रधान कारण वीर्य-नाश ही है । जो पुरुष वात्सावरथा से ही विषय-वास-नाओं में कैसफ़र, अपनी आत्मरिक्त धातुओं को दुर्बल कर खालते हैं, वे कदापि इससे नहीं बच सकते ।

इसने अपनी आँखों देखा है कि जीवनारथा में सरने वाले पुरुष प्रायः इसी रोग से ग्रस्त होते हैं । बहुत सी युवती दुष्क-मित्री नियों भी इस रोग से ग्रस्ती हैं । अत्युभित रूप में वीर्य का च्युत करने से हृदय और कुण्डल में रक्त के सञ्चालन और शोधन की शक्ति नहीं रह जाती । यीथोदि सात प्रातुओं के धनने की किया नष्ट हो जाती है । दिन पर दिन विकार बढ़ता जाता है । मन्दाग्नि, अग्नि, संयुग्मणी और वातव्याधि आदि रोग भी इसके कारण उत्पन्न हो जाते हैं । मनुष्य सर्वोद्भूत से वीर्य होकर एक दिन अकाल मृत्यु से मारा जाता है ।

इस रोग के प्रारम्भ में वीर्य-रक्षा का कड़ा नियम है । इस किया से इस च्युती मनुष्य का जीवन कुछ बढ़ जाता है । यदि इसने पर भी इन्द्रिय-लोहपता न दृष्टी, तो वह मनुष्य और भी पहले निष्प्राण होकर, अपने कुल वालों को शोक में छोड़ जाता है ।