ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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जरा और मृत्यु
१०—जरा और मृत्यु
“मा पुत्रा जररतो मृयाः ।”
( अथर्ववेद )
हे जीव ! तू वृद्धता से पूर्ण मत मर ।
“वृद्धत्वे जीवन-न्ययम् ।”
वृद्धता के आने पर ही आगुर्वल का नाश होता है ।
आज कल भी मनुष्य के मरने की अवस्था वृद्धता मानी गई है । जो लोग वृद्धता से पहले अपनी ऐहिक लीला समाप्त कर देते हैं, उनके लिये लोग बहुत शोक करते हैं, पर इस बात पर जरा भी ध्यान नहीं देते कि किस कारण से उसकी झकास मृत्यु हुई । प्राचीन काल में वृद्धता से पहले लोग मरते ही नहीं थे । जिसके राज्य में कोई बालक या युवा मर जाता था, वह राजा अचरमी समझा जाता था । श्रीराम के राजत्व में एक ब्राह्मण का युवा पुत्र मर गया, सो उस ब्राह्मण को बड़ा आश्चर्य हो गया था । उस समय की और आज की परिस्थिति में आकाश-पातल का अन्तर हो गया है । सौ में एकाध पुनः ही अपना वृद्धता को प्राप्त कर सकते हैं । शेष नित्यानन्द लोग बाल्य और युवावस्था में ही इस संसार से चल बसते हैं ।
इस दुःखमयी वार्ता का एक मात्र कारण ब्रह्मचर्य का अभाव है । जब तक इस देश में ब्रह्मचर्य का सुधार तथा प्रचार नहीं होता, तब तक इसका रोकना सम्भव नहीं ।
मनुष्य-शरीर की तीन अवस्थायें मानी गई हैं । बाल्य, और युवा के पश्चात् वृद्धावस्था होती है । इसलिये इस समय से पहले मरना पाप का कारण समझना चाहिये । अपने धीर्य की