ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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जाता है, तब उसमें फिर मल नहीं रहता। अर्थात् वीर्य के परचात् फिर कोई क्रिया रोप नहीं रहती।
हम पहले कह चुके हैं कि शरीर का सार वीर्य ही है। यही इसका आधार भी है। अतएव इसके कार्य भी बड़े महत्व के हैं। वे नीचे दिये जाते हैं:—
(१) वीर्य ही हृदय को पुष्ट तथा कर्तव्यशील बनाता है।
(२) वीर्य से ही सर्वाङ्ग में जीवनी-शक्ति सञ्चालित होती रहती है।
(३) वीर्य से ही मस्तिष्क शान्त और विचार-शक्ति-सम्पन्न रहता है।
(४) वीर्य से ही दृष्टि तथा श्रवण-शक्ति स्थिर रहती है।
(५) वीर्य से ही निर्भयता, स्वतन्त्रता, चत्ताह, साहस तथा पराक्रम आदि गुण बढ़ते हैं।
(६) वीर्य से ही आलस्य, रोग, निर्बलता, कलुषता, दुःख, अज्ञान तथा अविनय आदि दुर्गुण दूर किये जा सकते हैं।
(७) वीर्य के बिना सभी कार्य असिद्ध हो जाते हैं।
(८) वीर्य ही सन्तानोत्पत्ति का मूल है।
(९) वीर्य मनुष्य की सुन्दरता, सम्भ्यता, पवित्रता, धैर्य, पुरष तथा सद्व्यवहार का कारण है।
(१०) कहने का सारांश यह है कि शरीर में वीर्य ही सब कुछ कार्य करता है। इसकी हीनता से सारे व्यापार हीन हो जाते हैं।