ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मचर्य-विमान
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२३वा करने वाला पुरुष इससे पहले कभी भर नहीं सकता ! इस कथन को हम सुवर्ण के पत्र पर निर्भयता से लिंक सकते हैं ।
शारीर के सम्बन्ध में विशेष अनुभव की बात कहने वास ग्रन्थ आयुर्वेद माना जाता है । उसकी भी सम्मति है कि मनुष्य का जीवन उसके शारीरिक-गठन पर निर्भर करता है । आयुर्विज्ञान के प्राचीन आचार्यों ने बहुत कुछ इस सम्बन्ध में अनुसन्धान किया है । उनकी बातें कभी भूटी नहीं हो सकतीं ।
पर आज तो अवस्था उसके विपरीत है । ऐसा क्यों हुआ ! दिन पर दिन ब्रह्मचर्य का लोप होता गया । विलासिता और व्यभिचार के कारण मनुष्य-जाति अपने ईश्वर-दूत दीर्घ-जीवन रूप अधिकारों को खोती गई और वह इतनी पतित होती जा रही है कि अपना आयुर्वेद रखते हुये भी अकाल मृत्यु के मुख में पड़ रही है । अतः हम चल पूर्वक इस बात को कहते हैं कि यदि मानव-जाति पुनः अपना पत्थन करना चाहती है—फिर भी वह अपने आयुर्वेद की प्राचीन वैद्यक कथितोक्त मर्यादा बौधन चाहे, तो ब्रह्मचर्य की प्रणाली के प्रचार और विधिवत सुधार में देर न लगावे ।
हमें पूरा विश्वास है कि १२० वर्ष के आयुर्भोग के लिये हमारी आश्रम-प्रणाली ही पर्याप्त होगी । इससे अधिक भी दीर्घ-जीवन प्राप्त किया जा सकता है, पर वह योगाभ्यास की क्रिया के अधीन है !