भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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आयुर्वेद का कारण

११—आयुर्वेद का कारण

हृदय चेतनास्थान भोजसन्ध्याश्रयं मतम् । शरीर प्राणयोरैर्व, संयोगादायुक्त्येत ।

( शार्द्वर-संहिता )

हृदय चेतनता का स्थान और ओज का आश्रय-ज्ञाता है । इस प्रकार शरीर और प्राण के संयोग का नाम 'आयु' है ।

मनुष्य-शरीर में हृदय एक बहुत ही उत्तम तथा आवश्यक पदार्थ है । महर्षियों का मत है कि गर्भ में भी पहले पहले इसका आढुआव होता है ।

चेतन तथा ओज का भी यही स्थान है । यहाँ से रक्त का सञ्चालन और शुद्धीकरण होता है । प्राणों का भी इससे वनिष्ठ सम्बन्ध है । जिस हृदय का हम इस प्रकार वर्णन कर रहे हैं, वही आयु का भी कारण है । जिसका हृदय निर्वल हो जाता है, वह बहुत कम दिनों तक जीती है । इसलिये हृदय की पुष्टता आयु के लिये विशेष आवश्यक होना है । अतएव 'हम हृदय के पुष्ट रखने के लिये कुछ प्रधान बातें बतलाना चाहते हैं'—

( १ ) वीर्य-रत्ना से ही हृदय पुष्ट तथा कार्यकारी बन सकता है ।

( २ ) माषायाम से वीर्य-रत्ना हो सकती है और हृदय स्वस्थ रह सकता है ।

( ३ ) व्यायाम से हृदय की शक्ति बढ़ती रहती है ।

( ४ ) उत्तम आहार से वीर्य बनता है और हृदय बलवान होता है ।