ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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आयुर्वेद का कारण
११—आयुर्वेद का कारण
हृदय चेतनास्थान भोजसन्ध्याश्रयं मतम् । शरीर प्राणयोरैर्व, संयोगादायुक्त्येत ।
( शार्द्वर-संहिता )
हृदय चेतनता का स्थान और ओज का आश्रय-ज्ञाता है । इस प्रकार शरीर और प्राण के संयोग का नाम 'आयु' है ।
मनुष्य-शरीर में हृदय एक बहुत ही उत्तम तथा आवश्यक पदार्थ है । महर्षियों का मत है कि गर्भ में भी पहले पहले इसका आढुआव होता है ।
चेतन तथा ओज का भी यही स्थान है । यहाँ से रक्त का सञ्चालन और शुद्धीकरण होता है । प्राणों का भी इससे वनिष्ठ सम्बन्ध है । जिस हृदय का हम इस प्रकार वर्णन कर रहे हैं, वही आयु का भी कारण है । जिसका हृदय निर्वल हो जाता है, वह बहुत कम दिनों तक जीती है । इसलिये हृदय की पुष्टता आयु के लिये विशेष आवश्यक होना है । अतएव 'हम हृदय के पुष्ट रखने के लिये कुछ प्रधान बातें बतलाना चाहते हैं'—
( १ ) वीर्य-रत्ना से ही हृदय पुष्ट तथा कार्यकारी बन सकता है ।
( २ ) माषायाम से वीर्य-रत्ना हो सकती है और हृदय स्वस्थ रह सकता है ।
( ३ ) व्यायाम से हृदय की शक्ति बढ़ती रहती है ।
( ४ ) उत्तम आहार से वीर्य बनता है और हृदय बलवान होता है ।
अहर्चार्य-विज्ञान
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(५) नीरोग रहने से हृदय कभी चीखा नहीं होता। ऊपर लिखी हुई बातों से हृदय चलिष्ट और हर्षित रहता है। और यही हृदय आयु का कारण है। इसलिये जो लोग आयु के इच्छुक हों, वे अपने हृदय की रक्षा करते रहें। ऐसे कार्य न करें, जिससे कि उनका हृदय निर्बल हो जाय !
१२—वीर्य-च्य से राजरोग
“नष्टे शुक्ले सर्वे रोगा भवन्ति।”
(सूक्त)
वीर्य के अभाव में अनेक रोग उत्पन्न होते हैं।
यह बात बहुत सत्य है कि जिसके शरीर में वीर्य की कमी हो जाती है, उसके शरीर में नाना प्रकार के रोग घर कर लेते हैं। वीर्य-नाश से जिन महा रोगों की उत्पत्ति होती है, हम उनमें से कुछ प्रधान रोगों का यहाँ संक्षिप्त रूप से वर्णन कर देना चाहते हैं:—
(१) प्रमेह
जब मनुष्य का वीर्य विगड़ कर स्पर्श शरीर से किसी न किसी रूप में बाहर निकलने लगता है, तब उसे ‘प्रमेह’ कहते हैं।
प्रमेह का नाम लेते ही एक घार हृदय घड़कने लगता है। यह अत्यन्त भयङ्कर और भारत-व्यापी रोग है। वैद्यक-शास्त्र में जन्म के छेत्र से यह २० प्रकार का माना गया है। इसकी अन्तिम
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वीर्य-ज्ञय से राज रोग
अवस्था में प्राणों का नाश हो जाता है । इसके उत्पन्न होने के निम्नलिखित कारण बतलाये गये हैं :—
अधिक वीर्य नष्ट करने से—कुसमय में सम्भोग करने से—प्रकृति-विरुद्ध कार्य करने से—नया पान, गुड़, दही, दूध, तैल, मिर्ची और खट्वाई आदि अधिक खाने से—विशेष मछली-मांस के सेवन से तथा कफ-वर्द्धक पदार्थों के खाने से प्रमेह रोग उत्पन्न होता है । सब प्रकार के प्रमेह चिरस्थायी नहीं होते, पर वीर्य-ज्ञय से जो उत्पन्न होता है, वही हानिकारक होता है ।
आजकल प्रायः १५ सैकड़े लोग इस प्राण-विनाशक रोग के हाथ में पड़े हुये हैं । बहुत से लोग ऊपर से देखने में बड़े दृष्ट-पुष्ट दीखते हैं, पर भीतर ही भीतर उनमें प्रमेह बढ़ता रहता है । पहले तो इसका लोगों को ज्ञान नहीं होता, पर जब यह प्रवल हो जाता है, तब लोगों को इसकी चिन्ता व्यापती है । यदि अच्छे चिकित्सक से काम पड़ा और उसके कहने के अनुकूल संयम किया गया, तब तो कुछ आशा होती है, नहीं तो भरकर ही मनुष्य को इससे मुक्ति होती है ।
प्रमेह में सर्वाङ्ग का वीर्य मूत्र के साथ अनिच्छापूर्वक बाहर निकलाने लगता है । जब यह अधिकघट जाता है, उस अवस्था में सब धातु इसी के साथ गल-गल कर शरीर के बाहर हो जाती हैं । वह मनुष्य निस्तेज, दुर्बल, पीला, अज्ञानी, डन्मादी और चिड़चिड़ा हो जाता है । उसे भोजन नहीं पचता, दस्त ठीक नहीं होती—निद्रा अच्छी तरह से नहीं आती और मस्तिष्क में सौंय-सौंय शब्द होते रहते हैं । ज़मेही पुरुष मरण से बढ़कर कष्ट सहता हुआ योद्धे ही दिनों में काल का प्राप्त बनता है ।
प्राप्तचर्य-विधान
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(२) च्युत या यच्छा
इसमें शरीर के बारे दोष प्रकृत होकर नष्ट होने लगते हैं और हृदय और कुण्डल अस्मत्त हो जाते हैं । इसी को 'च्युत' कहते हैं । च्युत या यच्छा भी प्रसूत की शक्ति घटा भयानक संक्रामक रोग है । अनेक नवयुवक इसके कारण अपने प्राणों को असमय में खो बैठते हैं ।
इसके प्रारम्भ होने के भी कई कारण हैं, पर सर्व-प्रधान कारण वीर्य-नाश ही है । जो पुरुष वात्सावरथा से ही विषय-वास-नाओं में कैसफ़र, अपनी आत्मरिक्त धातुओं को दुर्बल कर खालते हैं, वे कदापि इससे नहीं बच सकते ।
इसने अपनी आँखों देखा है कि जीवनारथा में सरने वाले पुरुष प्रायः इसी रोग से ग्रस्त होते हैं । बहुत सी युवती दुष्क-मित्री नियों भी इस रोग से ग्रस्ती हैं । अत्युभित रूप में वीर्य का च्युत करने से हृदय और कुण्डल में रक्त के सञ्चालन और शोधन की शक्ति नहीं रह जाती । यीथोदि सात प्रातुओं के धनने की किया नष्ट हो जाती है । दिन पर दिन विकार बढ़ता जाता है । मन्दाग्नि, अग्नि, संयुग्मणी और वातव्याधि आदि रोग भी इसके कारण उत्पन्न हो जाते हैं । मनुष्य सर्वोद्भूत से वीर्य होकर एक दिन अकाल मृत्यु से मारा जाता है ।
इस रोग के प्रारम्भ में वीर्य-रक्षा का कड़ा नियम है । इस किया से इस च्युती मनुष्य का जीवन कुछ बढ़ जाता है । यदि इसने पर भी इन्द्रिय-लोहपता न दृष्टी, तो वह मनुष्य और भी पहले निष्प्राण होकर, अपने कुल वालों को शोक में छोड़ जाता है ।
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वीर्य-च्युत से राजयोग
(२) स्वप्न दोष
“नास्ति जागरितो भयम् ।”
( चाणक्य नीति )
जागृत रहने वाले पुरुष को किसी प्रकार का भय नहीं रहता। रोगों में ‘स्वप्न-दोष’ भी अत्यन्त भयङ्कर रोग है। जिसे एक बार लग जाता है, उसके प्राणों की बचती है। इसकी भी अन्तिम अवस्था मृत्युकारक होती है।
यह रोग विद्याथियों और विवाहित पुरुषों का जन्म-संघाती हो जाता है। हमने बहुत से लोगों को इससे पीड़ित देखा है।
स्वप्न-दोष से मुख की प्रसन्नता जाती रहती है—दुष्टि नष्ट हो जाती है—हृदय में दुर्बलता आ जाती है—चित्त में हर समय उदासीनता रहती है और कहीं भी शान्ति नहीं मिलती। मेरुदण्ड तथा सिर में पीड़ा अधिक होती रहती है। स्मरण-शक्ति घट जाती है और अनेक शारीरिक रोग उत्पन्न हो जाते हैं।
रात में सो जाने पर जो दृश्य दिखलाई देता है, वह मनुष्य को सत्य जान पड़ता है। इसीसे वह उसमें लिप्त हो जाता है। कभी ऐसा जान पड़ता है कि एक दुवती खी आई और उससे जाकर सम्भोग करने लगता है। फिर क्या! चणमात्र में उसका वीर्य शरीर से बाहर हो जाता है और निद्रा दृढ़ जाती है। इस प्रकार वीर्य-च्युत का नाम स्वप्नदोष है। स्वप्न-दोष में वास्तविक खी-भ्रंशङ्ग से कहीं अधिक वीर्य-पात होता है। स्वप्न-दोषी पुरुष कुछ दिनों में अशक्त और हतवीर्य हो जाता है। इसके उत्पन्न होने के निम्नलिखित कारण हैं—
ग्रहचर्य-विज्ञान
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शरीर में अधिक शीतोष्णता के बढ़ने से—विरोध विकला पदार्थ के खाने से—अत्यन्त परिश्रम, चिन्ता और शोक से—उत्तान होकर सोने से—काम सम्बन्धी विचार कर सोने से तथा अस्वाभाविक या स्वाभाविक रीति से चर्य-नाश करने से यह विकार उत्पन्न होता है।
प्रारम्भ में इसे साधारण रोग समझ कर लोग छोड़ देते हैं जब प्रबल हो जाता है, तब किसी प्रकार नहीं रुक सकता। अन्त में शारीरिक तथा मानसिक समस्त शक्तियों को नष्ट कर प्राणों का घातक बन जाता है।
(४) नपुंसकता
“वीर्यवाहि शिराधारी, वृषणी पौरुषा चहो।”
(शार्ङ्गधर-संहिता)
वीर्य-वाहिनी शिराओं के आधार अण्डकोष होते हैं। और ही पुंसत्व के देने वाले हैं।
वैद्यक-शास्त्र में कई प्रकार के नपुंसकों का वर्णन है, पर जिस नपुंसक का हम वर्णन करते हैं, वह और भी विचित्र होता है। जो लोग दैवी प्रकोप से नपुंसक होते हैं, उन्हें तो कुछ कहन ही नहीं, पर यह नपुंसक अपने पुंसत्व को कुकर्मों द्वारा खो कर होता है।
भारतवष में इस 'नपुंसकता' का रोग दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है। इसकी चिह्नित्सा भा नहीं होती। इस नपुंसकता में बड़े बड़े लोग फँस जाते हैं। इसके उत्पन्न होने के निम्नलिखित प्रधान कारण हैं:—
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वीर्य-रक्षा से लाभ
(१) अत्यन्त मैथुन, बहुखी-गमन—बाल-विवाह तथा अनैसर्गिक सम्बन्ध से नपुंसकता उत्पन्न होती है।
(२) किसी कारणवश पुरुष होने की योग्यता न रहने का नाम “नपुंसकता” है। इस नपुंसकता में बूढ़ों की कौन कहे, योड़ी-योड़ी अवस्था के नवयुवक भी फँस रहे हैं। शिवा-दीवा का समुचित प्रबन्ध न रहने के कारण प्रकृति के नियमों के प्रतिकूल जाकर प्रसमय में ही लोग अपने पुंसत्व को खो बैठते हैं।
(३) जीवनसाधार अण्डकोषों की शक्ति क्षीण हो जाती है—शितेन्द्रिय में उत्तेजना नहीं रहती—तनिक भी कामेच्छा होते ही वीर्य स्खलित हो जाता है—संसार का साधारण से साधारण कार्य भी उनसे नहीं किया जा सकता और अपनी स्त्री से सुँद छिपाना पड़ता है। इस रोग का रोगी गर्भधान नहीं कर सकता। उसके वीर्य से यदि बालक हो भी जाय तो वह जीवा नहीं बचता।
(४) नपुंसक पुरुष प्रायः मूर्ख, रोगी, लोभी, क्रोधी, कामी, अल्पशक्ति अल्पशुद्ध होता है।
१३—वीर्य-रक्षा से लाभ
“ब्रह्मचर्यं सदा रक्षेदध्या मैथुनं पृथक्।”
(दश-रहिता)
काठ प्रकार के मैथुनों से परे जो ब्रह्मचर्य है, उसकी सदा स्त्रा करनी चाहिये।
“श्रवश्यमेव भोक्तव्यं, हृतं कर्म शुभाश्रमम्।”
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ब्रह्मचर्य-विधान
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मनुष्य को जित छूत शुभ या अशुभ कर्म का फल अवश्य मिलता है।
ब्रह्मचर्य का अभिप्राय वीर्य-रत्ना है। वीर्य ही जीवन और शरीर का राजा है। इसके सञ्चित करने का बड़ा महत्व है। हमारे आर्य ऋषियों की महत्ता और उच्च ज्ञान-तपोनिष्ठा का प्रधान कारण भी यही ब्रह्मचर्य था। बड़े-बड़े विद्वान्, ज्ञानी, शूरवीर, यशस्वी तथा तेजस्वी होने का यही एक मूल कारण है। इससे होनेवाले कुछ लाभों का हम यहाँ संक्षिप्त रूप से वर्णन करते हैं:—
(१) ब्रह्मचर्य के बल पर असाध्य से असाध्य कर्म अवि-लम्ब किये जा सकते हैं। इसीलिये कार्य की सिद्धि तक लोग ब्रह्मचर्य से रहते हैं।
(२) ब्रह्मचर्य की शक्ति से तेजोवीर्य, शान्ति और आत्म-ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। यह बात हमें ऋषियों के उपदेश से ज्ञात होती है।
(३) जो पुरुष देश, धर्म और जाति की सेवा तथा रत्ना करना चाहे, वह ब्रह्मचर्य से रहने का यत्न करे।
(४) अन्तःकरण के पवित्र और शान्त रखने के लिये ब्रह्मचर्य ही परमोपचय है।
(५) सदैव प्रसन्न और सुखी रहने का उपाय अक्षुण्ण ब्रह्मचर्य है।
(६) जीवन की सफलता; सुन्दर स्वास्थ्य, दृष्ट-गुष्ट अज्ञाता, कार्य-कारिता और-उद्यम-शीलता के लिये ब्रह्मचर्य अमृत रूप है।
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वीर्य-नाश से हानि
(७) सङ्कटेश्वर, सदाचार, खाल-शासन, खाधीन विचार और विभ-श्रेम, ये सब गुण ब्रह्मचर्य के वशीभूत हैं।
(८) सुसन्तान, खी-सुख, कुटुम्ब की अनुकूलता तथा सन्वन्धियों का सदुन्मवहार, सब की प्राप्ति ब्रह्मचर्य से होती है।
(९) ब्रह्मचर्य से ही अमृत का लाभ कर वासना रूपी क्रूरों को नाश किया जा सकता है।
(१०) ब्रह्मचर्य से ही, दिव्य-ज्ञान और सच्चे अनुभव मिलते हैं, जिनसे मनुष्य दुर्गमता तथा दुष्कर्मों से मुक्ति पा जाता है।
फलतः ब्रह्मचर्य की रक्षा से अलभ्य लाभ होते हैं। जो लोग इसे धारण करते हैं, वे ही इस के स्वाद को कुछ जान सकते हैं।
१४—वीर्य-नाश से हानि
“सर्वस्वातुष्टितं कार्यं, हन्यतेऽब्रह्मचर्यायां।”
(सक्ति)
मनुष्य का सब अनुष्ठान किया हुआ कार्य ब्रह्मचर्य के नाश से नष्ट हो जाता है।
“विवेक-प्रधानां, भवति विनिपातः शतमुखाः।”
(भर्तृहरि-शतक)
जो लोग विवेक से भ्रष्ट हो जाते हैं, वे षरावर पतित होते जाते हैं।
ब्रह्मचर्य के नष्ट होने पर अनेक उपद्रव खड़े हो जाते हैं। इसके दुष्परिणामों की संख्या भी नहीं लगाई जा सकती। फिर
ब्रह्मचर्य-विधान
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भी हम इसके अभाव से होने वाली हानियों का कुछ वर्णन यहाँ पर कर देना चाहते हैं:—
(१) ब्रह्मचर्य के नाश से अन्तःकरण अपवित्र और दुर्बल हो जाता है ।
(२) वीर्य-क्षय से मन मलीन, शरीर हीन और आत्मा अनुत्साही बन जाता है ।
(३) ब्रह्मचर्य का नाश करनेवाला पुरुष बिना तेल के दीपक की भाँति लुफ जाता है ।
(४) वीर्य-नाश से पद-पद पर विपत्तियाँ आती रहती हैं, जो रोकी नहीं जा सकती ।
(५) बड़े-बड़े पुरुष भी ब्रह्मचर्य से पतित होते ही संसार में आँसू हो गये ।
(६) वीर्य-क्षय से धातु-रोग, रक्तविकार, शिरोरोग, दृष्टि-हीनता, अजीर्ण, कोष्ठवद्धता, मन्थ, वात, पक्षाघात, मन्दाग्नि, हृदय हीनता, आलस्य, उन्माद, भ्रम, सुग्री, श्वास, भय आदि अनेक शारीरिक और मानसिक रोग उत्पन्न होते हैं ।
(७) वीर्य-नाश से आनन्द, साहस, धैर्य, वीरत्व, तेज, शान्ति, ज्ञान और सद्भाव आदि नष्ट हो जाते हैं ।
(८) वीर्य-नाश से बढ़ कर महा पातक है ही नहीं ।
(९) वीर्य-क्षय, धम और घ्न के क्षय का कारण बनता है ।
(१०) एक विन्धु वीर्य-नाश से असंख्य जीवों की हत्या होती है ।
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अमोघवीर्य और ऊर्ध्वरेता
१५.—अमोघवीर्य और ऊर्ध्वरेता
“ब्रह्मचारी न फाञ्चन श्राविमाञ्जलि ।”
( वात=ज्रा० )
ब्रह्मचारी को कभी किसी भौंलि का फट नहीं होता ।
“ब्रह्मचारी ब्रह्म ब्राजद्विभरि ।
तस्मिन्नेवाश्रयिविषेसमोत्ता॥”
ब्रह्मचारी तेजस्वी वीर्य का संग्रह करता है । इसलिये उसमें समस्त देवगण वास करते हैं ।
वीर्य-भेद से अमोघवीर्य और ऊर्ध्वरेता नाम के दो प्रकार के ब्रह्मचारी होते हैं । इन दोनों प्रकार के ब्रह्मचारियों से संसार की सेवा होती है । इसलिये ये सर्वश्रेष्ठ गिने जाते हैं ।
‘अमोघवीर्य’ का अर्थ है—अपरिमित वीर्य वाला—और ‘ऊर्ध्वरेता’ का अर्थ है—वीर्य को ऊपर धारण करनेवाला । अमोघवीर्य का यह लक्षण है कि उसका वीर्य कभी निष्फल नहीं होता । उसके वीर्य से एक बार में निश्चय पूर्वक गर्भोत्पात हो जाता है और ऊर्ध्वरेता का यह है कि उसका वीर्य स्नान में भी स्थलित नहीं होने पाता अर्थात् वीर्य उसके अधिकार में रहता है ।
ऊपर के कहे हुए दोनों प्रकार के सिद्ध ब्रह्मचारी हैं । त्रिबिम्ब ब्रह्मचर्य के पालन से प्रत्येक पुरुष अमोघवीर्य और ऊर्ध्वरेता बन सकता है । दो में से एक बनना ही ब्रह्मचर्य का सब्बा ‘प्रमाण-पत्र’ है ।
प्राचीन समय में हमारे ऋषि लोग दोनों प्रकार के ब्रह्मचारी होते थे । बहुत से आर्य राजा भी ब्रह्मचर्य की सिद्धियों प्राप्त कर
ब्रह्मचर्य-विद्यान
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चुके हैं। महवियों में वशिष्ठ, पराशर और यमद्वनि तथा राजाओं में सगर और धृतराष्ट्र अमोघवीर्य के उदाहरण हैं। देवव्रत भीष्म और महावीर हनुमान ऊर्ध्वरेता थे।
अमोघवीर्य की अपेक्षा ऊर्ध्वरेता बनना परम कठिन है। अमोघवीर्य अपनी सिद्धि से इच्छित सन्तान उत्पन्न कर सकता है, पर यह आशा ऊर्ध्वरेता के लिये नहीं है। उसे अपनी महावीर्यता से केवल संसार-सेवा करने का अधिकार है। अमोघवीर्य बनने के लिये नियमित ब्रह्मचर्य का पालन करना आवश्यक है, पर ऊर्ध्वरेता के लिये ब्रह्मचर्य के साथ साथ योग का भी अनुशासन है। अमोघवीर्य होने से सर्वोन्नत मनुष्य की गति होती रहती है। इससे शरीर बलवान हो जाता है—मानसिक शक्ति की वृद्धि होती है—उत्साह और साहस नहीं नष्ट होता—मुख की कान्ति नहीं घटती एवं शीघ्र वृद्धता नहीं आती। उसकी सन्तान में भी तेजस्विता, विद्वत्ता और गुणवत्ता स्वाभाविक होती है। ऊर्ध्वरेता होने से वीर्य कभी नष्ट नहीं होता। इसलिये सब शरीर वज्र बन जाता है—रोगों का आक्रमण नहीं होता—दिव्य-दृष्टि प्राप्त होती है तथा परमात्मा की भी अभिलम्ब प्राप्त होती है। यहाँ तक कि मृत्यु को भी अधिकार में किया जा सकता है। उस का कोई व्रत निष्फल नहीं हो सकता। अब पाठक अमोघवीर्य और ऊर्ध्वरेता होने का तात्पर्य भली भाँति समझ गये होंगे। इस समय हमारे देश और समाज को दोनों प्रकार के ब्रह्मचारियों की नितान्त आवश्यकता है। बिना इनके सुधार होने की आशा केवल निराशा है।
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ब्रह्मचर्य के कुछ उपदेश
१६—ब्रह्मचर्य के कुछ उपदेश
१—ब्रह्मचर्य के पालन से मनुष्य को इहलोक और परलोक के सुधारने का साधन मिलता है ।
२—शास्त्रार्थ में और युद्ध में विजयी बनाने वाला ब्रह्मचर्य ही है ।
३—दीर्घ जीवन, उत्तम स्वास्थ्य, सुसन्तान तथा सम्पत्ति के लिये ब्रह्मचर्य ही परम साधन है ।
४—एक ब्रह्मचारी पुरुष ही यज्ञ करने वालों से श्रेष्ठ और प्रशंसित है ।
५—वीर्य ही इस शरीर का राजा है । इसके चीण होने से शारीरिक सभी शक्तियाँ दुर्बल और निस्तेज हो जाती हैं ।
६—वीर्य का एक एक कण जीवनी शक्ति से भरा हुआ है । जो इसे रक्षित रखता है, वह अपना आयुवृद्ध बढ़ाता है ।
७—जब तक वीर्य अपरिपक्व है, तब तक इसे कभी नष्ट न करना चाहिये ।
८—जो यौवनावस्था में अपने वीर्य का नाश कर देता है, वह कभी सुखी नहीं हो पाता ।
९—वीर्यवान होने के कारण ही प्राचीन लोग बड़े विद्वान् और पराक्रमी होते थे ।
१०—हीनवीर्य पुरुष को अपने कामों में बहुत कम सफलता मिलती है ।
११—काम-चिकारों को दवा देना ही इन्द्रिय-दमन है । जिसका मन शुद्ध और संयमी है, वही अपने वीर्य को रोक सकता है ।
ब्रह्मचर्य-विधान
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१२—आदर्श ब्रह्मचर्य बही है, जिसमें मन में भी काम-विकार उत्पन्न न हो। यही वीर्य रक्षण का प्रधान उपाय है।
१३—अध्यापकों का धर्म है कि वे सब से पहले बालकों को ब्रह्मचर्य की महत्ता समझा कर फिर विद्यादान करें।
१४—पुरुष को कम से कम २५ वर्ष और स्त्री को १६ वर्ष तक ब्रह्मचर्य की रक्षा करने चाहिए। कारण यह है कि इतनी अवस्था तक उनका वीर्य और रज अपरिपक्व रहता है।
१५—जो लोग अपने अपरिपक्व वीर्य को नष्ट करते हैं, वे अपनी शारीरिक और मानसिक शक्तियों को हीन कर देते हैं।
१६—वीर्य की परिपक्वता से सब शक्तियाँ भी परिपक्व और दृढ़ हो जाती हैं।
१७—बेद में पुरुषों की भौँचि स्त्रियों को भी ब्रह्मचर्य-पालन की आज्ञा है।
१८—ब्रह्मचर्य के बल से ही राजा पृथु ने समस्त प्रुथिवी को अधिकार में कर लिया था। ब्रह्मचर्य से ही परशुरामजी ने इक्ष्वाकु वार भूमण्डल के क्षत्रियों का नाश किया था। ब्रह्मचर्य के ही संरक्षण से भगवान् शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया था। ब्रह्मचर्य की प्रतिष्ठा से मार्कण्डेय ऋषि अमर हो गये। ब्रह्मचर्य की ही शक्ति से नक्षिकेता नाम के बाल-ब्रह्मचारी यमराज के यहाँ से सानन्द लौट आये। ब्रह्मचर्य से ही वित्तमह भीष्म महाभारत में अद्वितीय पुरुष कहलाये। ब्रह्मचर्य से ही हनुमानजी का नाम महावीर पड़ गया और वे जन्म भर श्रीरामचन्द्र के प्रिय सेवक और जानकी के व्यापार वने रहे। ब्रह्मचर्य के प्रताप से ही लक्ष्मण जी ने महाबली सेवताद को मारा। ब्रह्मचर्य के ही बल से श्रीराम
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ब्रह्मचर्य के कुछ उपदेश
ने जनकपुर में शिवजी के भीषण पिनाक को खण्ड-खण्ड कर ढाला। ब्रह्मचर्य की ही महिमा से शुकदेवजी को ८८ सहस्र बड़े-बड़े श्रुतियों में उच्चासन दिया गया। ब्रह्मचर्य-व्रत से ही शङ्कराचार्य ने पुनः वैदिक धर्म का प्रचार किया। ब्रह्मचर्य के ही पालन से स्वामी दयानन्द ने पाखण्डों का खण्डन कर सत्य धर्म को पुनः जागृत किया। जो कुछ संसार में उत्तमता नाम से प्रसिद्ध है, वह सब ब्रह्मचर्य की ही विभूति है।
षष्ठ स्कन्ध
—✥—
१—ब्रह्मचन्दना
ॐ अग्ने नय सुपथा राये ब्रह्मान्, विभ्वानि देव षड्वानि विद्वान् । युयोष्यस्मन्नु हुराप मेनो— भूविष्ठा ते नम उक्तिं विधेम ॥
( यजु० अ० ४० म० १६ )
हे अग्नि-रूप परमेश्वर ! तुम सब संसार के मार्ग-प्रदर्शक हो । अतएव तुम हमें उत्तम मार्ग से चलाओ ! जो हम में दुर्गुण हों, उन्हें बल-पूर्वक दूर करो ! हम तुम्हारी स्तुति करते हैं कि तुम हमें सुबुद्धि प्रदान करो !
तुम में अग्नि की सी तेजस्विता और दिव्यता है । तुम्हारी आर्थना से हमारे पापों का नाश होता है । हमें तुम आत्मवेज प्रदान कर दो, ताकि हम स्वयं अपने दुर्गुणों को नष्ट कर सकें । तुम में सर्वज्ञता है । वह बुद्धि के ही बल से प्राप्त होती है । यह ज्योति जिसे प्राप्त हो जाती है, वही निर्मल और निर्मय रह सकता है । हम तुम्हारी इसी के हेतु षपासना करते हैं । कृपा कर हमें बुद्धि-मान बनाओ, जिससे कि ब्रह्मचर्य में विघ्न न पड़ने पर हम दुर्गुणों का शीघ्र नाश कर सकें !
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आधुनिक विद्यार्थी
२—आधुनिक विद्यार्थी
चित्तायत्तं नृणां शुक्रं, शुक्रायत्तच्च जीवितम् । तस्माच्छुक्रं मनश्चेव, रक्षणीयं प्रयत्नतः ॥
चित्त के अधीन मनुष्य का वीर्य होता है, और वीर्य के बश- में जीवन है। इसलिये मन और वीर्य को अन्न-पूर्वक रक्षा करनी चाहिये।
आजकल देश का वायु-मण्डल इतना दूषित हो गया है कि उसके कारण हमारे बालक-विद्यार्थियों का सर्वनारा हो रहा है। जो विद्यार्थी शिक्षा के प्रधान पात्र समझे जाते हैं, वे अब दुर्गुणों के संधार या यों कहिये कि उत्पादक हो रहे हैं।
विद्यार्थी-अवस्था में बालकों की देख-रेख की बड़ी आवश्यक- कता है। उन पर जो संस्कार इस अवस्था में डाले जाते हैं, वे सर्वदा के लिये स्थायी होते हैं।
वास्तव में विद्यार्थी-जीवन बड़े महत्व का होता है। इस प्रागैभिक अवस्था में ही भाग्य-निर्माण का गुरुतर काम किया जाता है। इसी समय में विद्यार्थी को जितेन्द्रियता, परोपकार, ब्रह्मचर्य, सदाचार, ज्ञान-विज्ञान तथा संसार के विविध प्रकार के कला-कौशल का ज्ञान कराना जा-सुकता है। अतएव यह ज्ञान- वस्था बड़े दायित्व की समझी जानी चाहिये।
अत्यन्त खेद के साथ लिखना पड़ता है कि वर्तमान समय के विद्यार्थियों की दशा बड़ी शोचनीय हो रही है। वैदिक आर्य- धर्म-प्रशाली से शिक्षा न होने के कारण आधुनिक विद्यार्थी- समाज में नाना प्रकार के दोष घुस गये हैं। बालकों को सच्ची
महात्म्य-विज्ञान
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शिक्षा तो दी ही नहीं जाती। उन्हीं धर्म की शिक्षा न मिलने के कारण वे अपने जीवन को किसी योग्य नहीं बना पावे वात्स्यायस्था से ही उन पर कुसंस्कार पढ़ने लगते हैं। विद्या में अपूर्ण अज्ञों से उनमें पूर्ण ज्ञान का प्रकाश नहीं होने पाता। अज्ञानता-बश वे छुट्टे व्यवसनों के अभ्यासी बन जाते हैं। सौ में पाँच विद्यार्थी भी ब्रह्मचारी तथा कर्मनिष्ठ नहीं निकलते। विद्यालय में साक्षरता के साथ साथ अनेक दुर्गुण प्राप्त हो जाते हैं, जे यौवनावस्था में उसके पतन के प्रधान कारण होते हैं।
यह बात पूर्ण रूप से देखी गई है कि आधुनिक शिक्षित की अपेक्षा अधिक्षित लोग विशेष संयमी, ब्रह्मचारी, स्वस्थ तथा चतुर होते हैं! ऐसा क्यों? इसका उत्तर यही है कि आधुनिक विद्यार्थी-जीवन में अनेक दुर्गुण भर जाते हैं! शिक्षा-प्रणाली इस प्रकार की है कि उनका संशोधन नहीं कर सकती। अतः बॉ सुधार की आवश्यकता है।
हमारे प्यारे विद्यार्थियों, यदि तुम सच्चे विद्यार्थी बन क कुछ संसार की सेवा करना चाहते हो तो, उस कुशिक्षा से बचो जिसमें पंड कर सदाचार, स्वास्थ्य, ज्ञान, आत्मवेत तथा धर्म क नाश होता हो। यदि हमारी सम्मति लेना चाहते हो तो, उन गुरुकुलों की शिक्षा को प्राप्त कर, ब्रह्मचारी, विद्वान् तथा तेजस्वी बन कर, अपने मनुष्य-जीवन को सार्थक करो! तुम्हारी शक्ति ज्ञान, तुम्हारी इच्छा और तुम्हारे साहस से हां स्वाधीनता प्राप्त हो सकती है। हृत्-बीर्य लोगों के हाथों में कभी भी शासन नहीं उठर सकता। यदि धर्म के प्रति, जाति के प्रति और परमेश्वर के प्रति तुम्हारी कुछ भी श्रद्धा है और यदि तुम अपने को योग्य
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अपक धीर्य-पात के दोष
थाना चाहते हो, तो ज़ाज़वारी मनो—धीर्य के एक विन्दु को भी नष्ट न होने दो !
३—अपक धीर्य-पात के दोष
“मरणं विन्दुपातेन, जीवनं विन्दु-धारयाम् ।”
धीर्य के एक विन्दु नष्ट का होना मरण और एक विन्दु का धारण करना जीवन है ।
“अपकं दोष-कारयाम् ।”
अपरिपक्व वस्तु में दोष होते हैं ।
वास्तव में अपरिपक्वता बड़ी खुरी वस्तु है । इसकी रक्षा से ही जीवन में सफलता मिल सकती है । इस विषय में बहुत उत्तम कहा गया है—
वनस्पते रपकानि, फलानि प्रचिनोत्तियः ।
वनान्मोति रसं पन्थ्यो, बीजं च्वास्थं चिनश्च्यति ॥
( सृक् )
जो पुरुष विना पकी हुई वनस्पति के फलों को तोड़ना चाहता है उसे उसमें रस नहीं मिलता और उसका बीज भी नष्ट हो जाता है ।
कच्चे फल में सीठा रस नहीं होता । उसके बीज में पुष्टता और उत्पादन-शक्ति नहीं रहती । अतः इचित्त समय पर ही फल लेना योग्य है ।
यही बात मनुष्यों के लिये भी घटती है । मनुष्य शरीर में जब तक धीर्य अपरिपक्व है, तब तक उसकी रक्षा करनी चाहिये ।
ब्रह्मचर्य-विज्ञान
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चीर्य के बल से सब कार्य होते हैं। इसके बिना सारे कार्य निष्फल होते हैं।
पञ्चविशे ततो वर्पे पुमान् नारी तु पोडये।
समत्वा गतचीर्यौ तौ, जानीयात् कुशलौ मिषक् ॥
पचीस वर्ष में पुरुष का चीर्य और सोलह वर्ष में स्त्री का रज दोनों समान हो जाते हैं। इस बात को चतुर वैद्य जान सकते हैं।
यदि लोग इस वचन का उल्लंघन कर चीर्य-पात करने में प्रवृत्त हों, तो इससे निम्नलिखित दोष उत्पन्न हो जाते हैं:—
(१) कल्चे चीर्य के बाहर होने से शरीर की सभी धातुयें मिलतेज हो जाती हैं।
(२) शारीरिक विकास और सौन्दर्य नष्ट हो जाता है।
(३) ओज की कमी हो जाने से असन्तता और उत्साह भी घट जाता है।
(४) सब अङ्गों की शक्ति घट जाने से आयुर्वल भी कम हो जाता है।
(५) असमय में औरों की व्योति चीर्य हो जाती है। मुख के दाँत गिर जाते हैं। बाल भी पकने लगते हैं।
(६) पुरुष थोड़े ही दिनों में नपुंसक हो जाता है और स्त्री आत्चे से हाथ धो बैठती है।
(७) पहले तो सन्तान उत्पन्न नहीं होती। यदि होती भी है, तो बहुत कम दिन जीनेवाली और सब अङ्गों से दुर्बल होती है।