भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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आधुनिक विद्यार्थी

२—आधुनिक विद्यार्थी

चित्तायत्तं नृणां शुक्रं, शुक्रायत्तच्च जीवितम् । तस्माच्छुक्रं मनश्चेव, रक्षणीयं प्रयत्नतः ॥

चित्त के अधीन मनुष्य का वीर्य होता है, और वीर्य के बश- में जीवन है। इसलिये मन और वीर्य को अन्न-पूर्वक रक्षा करनी चाहिये।

आजकल देश का वायु-मण्डल इतना दूषित हो गया है कि उसके कारण हमारे बालक-विद्यार्थियों का सर्वनारा हो रहा है। जो विद्यार्थी शिक्षा के प्रधान पात्र समझे जाते हैं, वे अब दुर्गुणों के संधार या यों कहिये कि उत्पादक हो रहे हैं।

विद्यार्थी-अवस्था में बालकों की देख-रेख की बड़ी आवश्यक- कता है। उन पर जो संस्कार इस अवस्था में डाले जाते हैं, वे सर्वदा के लिये स्थायी होते हैं।

वास्तव में विद्यार्थी-जीवन बड़े महत्व का होता है। इस प्रागैभिक अवस्था में ही भाग्य-निर्माण का गुरुतर काम किया जाता है। इसी समय में विद्यार्थी को जितेन्द्रियता, परोपकार, ब्रह्मचर्य, सदाचार, ज्ञान-विज्ञान तथा संसार के विविध प्रकार के कला-कौशल का ज्ञान कराना जा-सुकता है। अतएव यह ज्ञान- वस्था बड़े दायित्व की समझी जानी चाहिये।

अत्यन्त खेद के साथ लिखना पड़ता है कि वर्तमान समय के विद्यार्थियों की दशा बड़ी शोचनीय हो रही है। वैदिक आर्य- धर्म-प्रशाली से शिक्षा न होने के कारण आधुनिक विद्यार्थी- समाज में नाना प्रकार के दोष घुस गये हैं। बालकों को सच्ची