भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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षष्ठ स्कन्ध

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१—ब्रह्मचन्दना

ॐ अग्ने नय सुपथा राये ब्रह्मान्, विभ्वानि देव षड्वानि विद्वान् । युयोष्यस्मन्नु हुराप मेनो— भूविष्ठा ते नम उक्तिं विधेम ॥

( यजु० अ० ४० म० १६ )

हे अग्नि-रूप परमेश्वर ! तुम सब संसार के मार्ग-प्रदर्शक हो । अतएव तुम हमें उत्तम मार्ग से चलाओ ! जो हम में दुर्गुण हों, उन्हें बल-पूर्वक दूर करो ! हम तुम्हारी स्तुति करते हैं कि तुम हमें सुबुद्धि प्रदान करो !

तुम में अग्नि की सी तेजस्विता और दिव्यता है । तुम्हारी आर्थना से हमारे पापों का नाश होता है । हमें तुम आत्मवेज प्रदान कर दो, ताकि हम स्वयं अपने दुर्गुणों को नष्ट कर सकें । तुम में सर्वज्ञता है । वह बुद्धि के ही बल से प्राप्त होती है । यह ज्योति जिसे प्राप्त हो जाती है, वही निर्मल और निर्मय रह सकता है । हम तुम्हारी इसी के हेतु षपासना करते हैं । कृपा कर हमें बुद्धि-मान बनाओ, जिससे कि ब्रह्मचर्य में विघ्न न पड़ने पर हम दुर्गुणों का शीघ्र नाश कर सकें !