ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंमहात्म्य-विज्ञान
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शिक्षा तो दी ही नहीं जाती। उन्हीं धर्म की शिक्षा न मिलने के कारण वे अपने जीवन को किसी योग्य नहीं बना पावे वात्स्यायस्था से ही उन पर कुसंस्कार पढ़ने लगते हैं। विद्या में अपूर्ण अज्ञों से उनमें पूर्ण ज्ञान का प्रकाश नहीं होने पाता। अज्ञानता-बश वे छुट्टे व्यवसनों के अभ्यासी बन जाते हैं। सौ में पाँच विद्यार्थी भी ब्रह्मचारी तथा कर्मनिष्ठ नहीं निकलते। विद्यालय में साक्षरता के साथ साथ अनेक दुर्गुण प्राप्त हो जाते हैं, जे यौवनावस्था में उसके पतन के प्रधान कारण होते हैं।
यह बात पूर्ण रूप से देखी गई है कि आधुनिक शिक्षित की अपेक्षा अधिक्षित लोग विशेष संयमी, ब्रह्मचारी, स्वस्थ तथा चतुर होते हैं! ऐसा क्यों? इसका उत्तर यही है कि आधुनिक विद्यार्थी-जीवन में अनेक दुर्गुण भर जाते हैं! शिक्षा-प्रणाली इस प्रकार की है कि उनका संशोधन नहीं कर सकती। अतः बॉ सुधार की आवश्यकता है।
हमारे प्यारे विद्यार्थियों, यदि तुम सच्चे विद्यार्थी बन क कुछ संसार की सेवा करना चाहते हो तो, उस कुशिक्षा से बचो जिसमें पंड कर सदाचार, स्वास्थ्य, ज्ञान, आत्मवेत तथा धर्म क नाश होता हो। यदि हमारी सम्मति लेना चाहते हो तो, उन गुरुकुलों की शिक्षा को प्राप्त कर, ब्रह्मचारी, विद्वान् तथा तेजस्वी बन कर, अपने मनुष्य-जीवन को सार्थक करो! तुम्हारी शक्ति ज्ञान, तुम्हारी इच्छा और तुम्हारे साहस से हां स्वाधीनता प्राप्त हो सकती है। हृत्-बीर्य लोगों के हाथों में कभी भी शासन नहीं उठर सकता। यदि धर्म के प्रति, जाति के प्रति और परमेश्वर के प्रति तुम्हारी कुछ भी श्रद्धा है और यदि तुम अपने को योग्य