भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

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अपक धीर्य-पात के दोष

थाना चाहते हो, तो ज़ाज़वारी मनो—धीर्य के एक विन्दु को भी नष्ट न होने दो !

३—अपक धीर्य-पात के दोष

“मरणं विन्दुपातेन, जीवनं विन्दु-धारयाम् ।”

धीर्य के एक विन्दु नष्ट का होना मरण और एक विन्दु का धारण करना जीवन है ।

“अपकं दोष-कारयाम् ।”

अपरिपक्व वस्तु में दोष होते हैं ।

वास्तव में अपरिपक्वता बड़ी खुरी वस्तु है । इसकी रक्षा से ही जीवन में सफलता मिल सकती है । इस विषय में बहुत उत्तम कहा गया है—

वनस्पते रपकानि, फलानि प्रचिनोत्तियः ।

वनान्मोति रसं पन्थ्यो, बीजं च्वास्थं चिनश्च्यति ॥

( सृक् )

जो पुरुष विना पकी हुई वनस्पति के फलों को तोड़ना चाहता है उसे उसमें रस नहीं मिलता और उसका बीज भी नष्ट हो जाता है ।

कच्चे फल में सीठा रस नहीं होता । उसके बीज में पुष्टता और उत्पादन-शक्ति नहीं रहती । अतः इचित्त समय पर ही फल लेना योग्य है ।

यही बात मनुष्यों के लिये भी घटती है । मनुष्य शरीर में जब तक धीर्य अपरिपक्व है, तब तक उसकी रक्षा करनी चाहिये ।