ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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चीर्य के बल से सब कार्य होते हैं। इसके बिना सारे कार्य निष्फल होते हैं।
पञ्चविशे ततो वर्पे पुमान् नारी तु पोडये।
समत्वा गतचीर्यौ तौ, जानीयात् कुशलौ मिषक् ॥
पचीस वर्ष में पुरुष का चीर्य और सोलह वर्ष में स्त्री का रज दोनों समान हो जाते हैं। इस बात को चतुर वैद्य जान सकते हैं।
यदि लोग इस वचन का उल्लंघन कर चीर्य-पात करने में प्रवृत्त हों, तो इससे निम्नलिखित दोष उत्पन्न हो जाते हैं:—
(१) कल्चे चीर्य के बाहर होने से शरीर की सभी धातुयें मिलतेज हो जाती हैं।
(२) शारीरिक विकास और सौन्दर्य नष्ट हो जाता है।
(३) ओज की कमी हो जाने से असन्तता और उत्साह भी घट जाता है।
(४) सब अङ्गों की शक्ति घट जाने से आयुर्वल भी कम हो जाता है।
(५) असमय में औरों की व्योति चीर्य हो जाती है। मुख के दाँत गिर जाते हैं। बाल भी पकने लगते हैं।
(६) पुरुष थोड़े ही दिनों में नपुंसक हो जाता है और स्त्री आत्चे से हाथ धो बैठती है।
(७) पहले तो सन्तान उत्पन्न नहीं होती। यदि होती भी है, तो बहुत कम दिन जीनेवाली और सब अङ्गों से दुर्बल होती है।