ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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वीर्य-नाश के प्रधान कारण
४—वीर्य-नाश के प्रधान कारण
विकार हेतो सति विकियन्ते । येषां न चेतानसि त एव धीराः ॥
( शक्ति )
विकार उत्पन्न करने वाले कार्यों के रहने पर भी, जिन पुरुषों की मनोवृत्तियाँ नहीं दिगवृत्तों, वे ही धीर कहलाते हैं ।
हमारी आर्य-जाति का दिन पर दिन पतन होता जा रहा है । इसकी चिन्तानजनक श्रवस्था पर विचार करने से एक बार हृदय पर घोर आघात होता है । प्राचीन गौरव के इतिहास की आधुनिक परिस्थिति से मिलाने से यही बात ज्ञात होती है कि इसकी अवनति का प्रधान कारण 'वीर्य-नाश' है । जब तक जाति में विषय-वासनाओं से घृणा रहती है, ज्यमिच्छार बुरी दृष्टि से देखा जाता है, ब्रह्मचर्य-विद्या के लिये पूर्ण रूप से उद्योग होता रहता है और सदाचार की शिक्षाएँ बढ़ती रहती हैं, तब तक वह कदापि वनति के शिखर से नहीं गिरती । जिस देश में वीर्य-नाश प्रारम्भ हो जाता है, वह अधिक दिनों तक नहीं जी सकता ।
अब हम वीर्य-नाश के कई प्रधान कार्यों का उल्लेख यहाँ पर कर देना चाहते हैं, जो जनता में अपना बिकराल रूप धारण कर उसको रसातल की ओर ले जा रहे हैं ।