ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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वीर्य-च्युत से राजयोग
(२) स्वप्न दोष
“नास्ति जागरितो भयम् ।”
( चाणक्य नीति )
जागृत रहने वाले पुरुष को किसी प्रकार का भय नहीं रहता। रोगों में ‘स्वप्न-दोष’ भी अत्यन्त भयङ्कर रोग है। जिसे एक बार लग जाता है, उसके प्राणों की बचती है। इसकी भी अन्तिम अवस्था मृत्युकारक होती है।
यह रोग विद्याथियों और विवाहित पुरुषों का जन्म-संघाती हो जाता है। हमने बहुत से लोगों को इससे पीड़ित देखा है।
स्वप्न-दोष से मुख की प्रसन्नता जाती रहती है—दुष्टि नष्ट हो जाती है—हृदय में दुर्बलता आ जाती है—चित्त में हर समय उदासीनता रहती है और कहीं भी शान्ति नहीं मिलती। मेरुदण्ड तथा सिर में पीड़ा अधिक होती रहती है। स्मरण-शक्ति घट जाती है और अनेक शारीरिक रोग उत्पन्न हो जाते हैं।
रात में सो जाने पर जो दृश्य दिखलाई देता है, वह मनुष्य को सत्य जान पड़ता है। इसीसे वह उसमें लिप्त हो जाता है। कभी ऐसा जान पड़ता है कि एक दुवती खी आई और उससे जाकर सम्भोग करने लगता है। फिर क्या! चणमात्र में उसका वीर्य शरीर से बाहर हो जाता है और निद्रा दृढ़ जाती है। इस प्रकार वीर्य-च्युत का नाम स्वप्नदोष है। स्वप्न-दोष में वास्तविक खी-भ्रंशङ्ग से कहीं अधिक वीर्य-पात होता है। स्वप्न-दोषी पुरुष कुछ दिनों में अशक्त और हतवीर्य हो जाता है। इसके उत्पन्न होने के निम्नलिखित कारण हैं—