भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ग्रहचर्य-विज्ञान

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शरीर में अधिक शीतोष्णता के बढ़ने से—विरोध विकला पदार्थ के खाने से—अत्यन्त परिश्रम, चिन्ता और शोक से—उत्तान होकर सोने से—काम सम्बन्धी विचार कर सोने से तथा अस्वाभाविक या स्वाभाविक रीति से चर्य-नाश करने से यह विकार उत्पन्न होता है।

प्रारम्भ में इसे साधारण रोग समझ कर लोग छोड़ देते हैं जब प्रबल हो जाता है, तब किसी प्रकार नहीं रुक सकता। अन्त में शारीरिक तथा मानसिक समस्त शक्तियों को नष्ट कर प्राणों का घातक बन जाता है।

(४) नपुंसकता

“वीर्यवाहि शिराधारी, वृषणी पौरुषा चहो।”

(शार्ङ्गधर-संहिता)

वीर्य-वाहिनी शिराओं के आधार अण्डकोष होते हैं। और ही पुंसत्व के देने वाले हैं।

वैद्यक-शास्त्र में कई प्रकार के नपुंसकों का वर्णन है, पर जिस नपुंसक का हम वर्णन करते हैं, वह और भी विचित्र होता है। जो लोग दैवी प्रकोप से नपुंसक होते हैं, उन्हें तो कुछ कहन ही नहीं, पर यह नपुंसक अपने पुंसत्व को कुकर्मों द्वारा खो कर होता है।

भारतवष में इस 'नपुंसकता' का रोग दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है। इसकी चिह्नित्सा भा नहीं होती। इस नपुंसकता में बड़े बड़े लोग फँस जाते हैं। इसके उत्पन्न होने के निम्नलिखित प्रधान कारण हैं:—