भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

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वीर्य-रक्षा से लाभ

(१) अत्यन्त मैथुन, बहुखी-गमन—बाल-विवाह तथा अनैसर्गिक सम्बन्ध से नपुंसकता उत्पन्न होती है।

(२) किसी कारणवश पुरुष होने की योग्यता न रहने का नाम “नपुंसकता” है। इस नपुंसकता में बूढ़ों की कौन कहे, योड़ी-योड़ी अवस्था के नवयुवक भी फँस रहे हैं। शिवा-दीवा का समुचित प्रबन्ध न रहने के कारण प्रकृति के नियमों के प्रतिकूल जाकर प्रसमय में ही लोग अपने पुंसत्व को खो बैठते हैं।

(३) जीवनसाधार अण्डकोषों की शक्ति क्षीण हो जाती है—शितेन्द्रिय में उत्तेजना नहीं रहती—तनिक भी कामेच्छा होते ही वीर्य स्खलित हो जाता है—संसार का साधारण से साधारण कार्य भी उनसे नहीं किया जा सकता और अपनी स्त्री से सुँद छिपाना पड़ता है। इस रोग का रोगी गर्भधान नहीं कर सकता। उसके वीर्य से यदि बालक हो भी जाय तो वह जीवा नहीं बचता।

(४) नपुंसक पुरुष प्रायः मूर्ख, रोगी, लोभी, क्रोधी, कामी, अल्पशक्ति अल्पशुद्ध होता है।

१३—वीर्य-रक्षा से लाभ

“ब्रह्मचर्यं सदा रक्षेदध्या मैथुनं पृथक्।”

(दश-रहिता)

काठ प्रकार के मैथुनों से परे जो ब्रह्मचर्य है, उसकी सदा स्त्रा करनी चाहिये।

“श्रवश्यमेव भोक्तव्यं, हृतं कर्म शुभाश्रमम्।”

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