ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मचर्य-विधान
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मनुष्य को जित छूत शुभ या अशुभ कर्म का फल अवश्य मिलता है।
ब्रह्मचर्य का अभिप्राय वीर्य-रत्ना है। वीर्य ही जीवन और शरीर का राजा है। इसके सञ्चित करने का बड़ा महत्व है। हमारे आर्य ऋषियों की महत्ता और उच्च ज्ञान-तपोनिष्ठा का प्रधान कारण भी यही ब्रह्मचर्य था। बड़े-बड़े विद्वान्, ज्ञानी, शूरवीर, यशस्वी तथा तेजस्वी होने का यही एक मूल कारण है। इससे होनेवाले कुछ लाभों का हम यहाँ संक्षिप्त रूप से वर्णन करते हैं:—
(१) ब्रह्मचर्य के बल पर असाध्य से असाध्य कर्म अवि-लम्ब किये जा सकते हैं। इसीलिये कार्य की सिद्धि तक लोग ब्रह्मचर्य से रहते हैं।
(२) ब्रह्मचर्य की शक्ति से तेजोवीर्य, शान्ति और आत्म-ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। यह बात हमें ऋषियों के उपदेश से ज्ञात होती है।
(३) जो पुरुष देश, धर्म और जाति की सेवा तथा रत्ना करना चाहे, वह ब्रह्मचर्य से रहने का यत्न करे।
(४) अन्तःकरण के पवित्र और शान्त रखने के लिये ब्रह्मचर्य ही परमोपचय है।
(५) सदैव प्रसन्न और सुखी रहने का उपाय अक्षुण्ण ब्रह्मचर्य है।
(६) जीवन की सफलता; सुन्दर स्वास्थ्य, दृष्ट-गुष्ट अज्ञाता, कार्य-कारिता और-उद्यम-शीलता के लिये ब्रह्मचर्य अमृत रूप है।