भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

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वीर्य-नाश से हानि

(७) सङ्कटेश्वर, सदाचार, खाल-शासन, खाधीन विचार और विभ-श्रेम, ये सब गुण ब्रह्मचर्य के वशीभूत हैं।

(८) सुसन्तान, खी-सुख, कुटुम्ब की अनुकूलता तथा सन्वन्धियों का सदुन्मवहार, सब की प्राप्ति ब्रह्मचर्य से होती है।

(९) ब्रह्मचर्य से ही अमृत का लाभ कर वासना रूपी क्रूरों को नाश किया जा सकता है।

(१०) ब्रह्मचर्य से ही, दिव्य-ज्ञान और सच्चे अनुभव मिलते हैं, जिनसे मनुष्य दुर्गमता तथा दुष्कर्मों से मुक्ति पा जाता है।

फलतः ब्रह्मचर्य की रक्षा से अलभ्य लाभ होते हैं। जो लोग इसे धारण करते हैं, वे ही इस के स्वाद को कुछ जान सकते हैं।

१४—वीर्य-नाश से हानि

“सर्वस्वातुष्टितं कार्यं, हन्यतेऽब्रह्मचर्यायां।”

(सक्ति)

मनुष्य का सब अनुष्ठान किया हुआ कार्य ब्रह्मचर्य के नाश से नष्ट हो जाता है।

“विवेक-प्रधानां, भवति विनिपातः शतमुखाः।”

(भर्तृहरि-शतक)

जो लोग विवेक से भ्रष्ट हो जाते हैं, वे षरावर पतित होते जाते हैं।

ब्रह्मचर्य के नष्ट होने पर अनेक उपद्रव खड़े हो जाते हैं। इसके दुष्परिणामों की संख्या भी नहीं लगाई जा सकती। फिर