ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
पृष्ठ 275, कुल 380 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मचर्य-विधान
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१२—आदर्श ब्रह्मचर्य बही है, जिसमें मन में भी काम-विकार उत्पन्न न हो। यही वीर्य रक्षण का प्रधान उपाय है।
१३—अध्यापकों का धर्म है कि वे सब से पहले बालकों को ब्रह्मचर्य की महत्ता समझा कर फिर विद्यादान करें।
१४—पुरुष को कम से कम २५ वर्ष और स्त्री को १६ वर्ष तक ब्रह्मचर्य की रक्षा करने चाहिए। कारण यह है कि इतनी अवस्था तक उनका वीर्य और रज अपरिपक्व रहता है।
१५—जो लोग अपने अपरिपक्व वीर्य को नष्ट करते हैं, वे अपनी शारीरिक और मानसिक शक्तियों को हीन कर देते हैं।
१६—वीर्य की परिपक्वता से सब शक्तियाँ भी परिपक्व और दृढ़ हो जाती हैं।
१७—बेद में पुरुषों की भौँचि स्त्रियों को भी ब्रह्मचर्य-पालन की आज्ञा है।
१८—ब्रह्मचर्य के बल से ही राजा पृथु ने समस्त प्रुथिवी को अधिकार में कर लिया था। ब्रह्मचर्य से ही परशुरामजी ने इक्ष्वाकु वार भूमण्डल के क्षत्रियों का नाश किया था। ब्रह्मचर्य के ही संरक्षण से भगवान् शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया था। ब्रह्मचर्य की प्रतिष्ठा से मार्कण्डेय ऋषि अमर हो गये। ब्रह्मचर्य की ही शक्ति से नक्षिकेता नाम के बाल-ब्रह्मचारी यमराज के यहाँ से सानन्द लौट आये। ब्रह्मचर्य से ही वित्तमह भीष्म महाभारत में अद्वितीय पुरुष कहलाये। ब्रह्मचर्य से ही हनुमानजी का नाम महावीर पड़ गया और वे जन्म भर श्रीरामचन्द्र के प्रिय सेवक और जानकी के व्यापार वने रहे। ब्रह्मचर्य के प्रताप से ही लक्ष्मण जी ने महाबली सेवताद को मारा। ब्रह्मचर्य के ही बल से श्रीराम