भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य के कुछ उपदेश

१६—ब्रह्मचर्य के कुछ उपदेश

१—ब्रह्मचर्य के पालन से मनुष्य को इहलोक और परलोक के सुधारने का साधन मिलता है ।

२—शास्त्रार्थ में और युद्ध में विजयी बनाने वाला ब्रह्मचर्य ही है ।

३—दीर्घ जीवन, उत्तम स्वास्थ्य, सुसन्तान तथा सम्पत्ति के लिये ब्रह्मचर्य ही परम साधन है ।

४—एक ब्रह्मचारी पुरुष ही यज्ञ करने वालों से श्रेष्ठ और प्रशंसित है ।

५—वीर्य ही इस शरीर का राजा है । इसके चीण होने से शारीरिक सभी शक्तियाँ दुर्बल और निस्तेज हो जाती हैं ।

६—वीर्य का एक एक कण जीवनी शक्ति से भरा हुआ है । जो इसे रक्षित रखता है, वह अपना आयुवृद्ध बढ़ाता है ।

७—जब तक वीर्य अपरिपक्व है, तब तक इसे कभी नष्ट न करना चाहिये ।

८—जो यौवनावस्था में अपने वीर्य का नाश कर देता है, वह कभी सुखी नहीं हो पाता ।

९—वीर्यवान होने के कारण ही प्राचीन लोग बड़े विद्वान् और पराक्रमी होते थे ।

१०—हीनवीर्य पुरुष को अपने कामों में बहुत कम सफलता मिलती है ।

११—काम-चिकारों को दवा देना ही इन्द्रिय-दमन है । जिसका मन शुद्ध और संयमी है, वही अपने वीर्य को रोक सकता है ।