भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 264, कुल 380 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 264

२६१

वीर्य-ज्ञय से राज रोग

अवस्था में प्राणों का नाश हो जाता है । इसके उत्पन्न होने के निम्नलिखित कारण बतलाये गये हैं :—

अधिक वीर्य नष्ट करने से—कुसमय में सम्भोग करने से—प्रकृति-विरुद्ध कार्य करने से—नया पान, गुड़, दही, दूध, तैल, मिर्ची और खट्वाई आदि अधिक खाने से—विशेष मछली-मांस के सेवन से तथा कफ-वर्द्धक पदार्थों के खाने से प्रमेह रोग उत्पन्न होता है । सब प्रकार के प्रमेह चिरस्थायी नहीं होते, पर वीर्य-ज्ञय से जो उत्पन्न होता है, वही हानिकारक होता है ।

आजकल प्रायः १५ सैकड़े लोग इस प्राण-विनाशक रोग के हाथ में पड़े हुये हैं । बहुत से लोग ऊपर से देखने में बड़े दृष्ट-पुष्ट दीखते हैं, पर भीतर ही भीतर उनमें प्रमेह बढ़ता रहता है । पहले तो इसका लोगों को ज्ञान नहीं होता, पर जब यह प्रवल हो जाता है, तब लोगों को इसकी चिन्ता व्यापती है । यदि अच्छे चिकित्सक से काम पड़ा और उसके कहने के अनुकूल संयम किया गया, तब तो कुछ आशा होती है, नहीं तो भरकर ही मनुष्य को इससे मुक्ति होती है ।

प्रमेह में सर्वाङ्ग का वीर्य मूत्र के साथ अनिच्छापूर्वक बाहर निकलाने लगता है । जब यह अधिकघट जाता है, उस अवस्था में सब धातु इसी के साथ गल-गल कर शरीर के बाहर हो जाती हैं । वह मनुष्य निस्तेज, दुर्बल, पीला, अज्ञानी, डन्मादी और चिड़चिड़ा हो जाता है । उसे भोजन नहीं पचता, दस्त ठीक नहीं होती—निद्रा अच्छी तरह से नहीं आती और मस्तिष्क में सौंय-सौंय शब्द होते रहते हैं । ज़मेही पुरुष मरण से बढ़कर कष्ट सहता हुआ योद्धे ही दिनों में काल का प्राप्त बनता है ।