भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 263, कुल 380 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 263

अहर्चार्य-विज्ञान

२६०

(५) नीरोग रहने से हृदय कभी चीखा नहीं होता। ऊपर लिखी हुई बातों से हृदय चलिष्ट और हर्षित रहता है। और यही हृदय आयु का कारण है। इसलिये जो लोग आयु के इच्छुक हों, वे अपने हृदय की रक्षा करते रहें। ऐसे कार्य न करें, जिससे कि उनका हृदय निर्बल हो जाय !

१२—वीर्य-च्य से राजरोग

“नष्टे शुक्ले सर्वे रोगा भवन्ति।”

(सूक्त)

वीर्य के अभाव में अनेक रोग उत्पन्न होते हैं।

यह बात बहुत सत्य है कि जिसके शरीर में वीर्य की कमी हो जाती है, उसके शरीर में नाना प्रकार के रोग घर कर लेते हैं। वीर्य-नाश से जिन महा रोगों की उत्पत्ति होती है, हम उनमें से कुछ प्रधान रोगों का यहाँ संक्षिप्त रूप से वर्णन कर देना चाहते हैं:—

(१) प्रमेह

जब मनुष्य का वीर्य विगड़ कर स्पर्श शरीर से किसी न किसी रूप में बाहर निकलने लगता है, तब उसे ‘प्रमेह’ कहते हैं।

प्रमेह का नाम लेते ही एक घार हृदय घड़कने लगता है। यह अत्यन्त भयङ्कर और भारत-व्यापी रोग है। वैद्यक-शास्त्र में जन्म के छेत्र से यह २० प्रकार का माना गया है। इसकी अन्तिम