ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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अमोघवीर्य और ऊर्ध्वरेता
१५.—अमोघवीर्य और ऊर्ध्वरेता
“ब्रह्मचारी न फाञ्चन श्राविमाञ्जलि ।”
( वात=ज्रा० )
ब्रह्मचारी को कभी किसी भौंलि का फट नहीं होता ।
“ब्रह्मचारी ब्रह्म ब्राजद्विभरि ।
तस्मिन्नेवाश्रयिविषेसमोत्ता॥”
ब्रह्मचारी तेजस्वी वीर्य का संग्रह करता है । इसलिये उसमें समस्त देवगण वास करते हैं ।
वीर्य-भेद से अमोघवीर्य और ऊर्ध्वरेता नाम के दो प्रकार के ब्रह्मचारी होते हैं । इन दोनों प्रकार के ब्रह्मचारियों से संसार की सेवा होती है । इसलिये ये सर्वश्रेष्ठ गिने जाते हैं ।
‘अमोघवीर्य’ का अर्थ है—अपरिमित वीर्य वाला—और ‘ऊर्ध्वरेता’ का अर्थ है—वीर्य को ऊपर धारण करनेवाला । अमोघवीर्य का यह लक्षण है कि उसका वीर्य कभी निष्फल नहीं होता । उसके वीर्य से एक बार में निश्चय पूर्वक गर्भोत्पात हो जाता है और ऊर्ध्वरेता का यह है कि उसका वीर्य स्नान में भी स्थलित नहीं होने पाता अर्थात् वीर्य उसके अधिकार में रहता है ।
ऊपर के कहे हुए दोनों प्रकार के सिद्ध ब्रह्मचारी हैं । त्रिबिम्ब ब्रह्मचर्य के पालन से प्रत्येक पुरुष अमोघवीर्य और ऊर्ध्वरेता बन सकता है । दो में से एक बनना ही ब्रह्मचर्य का सब्बा ‘प्रमाण-पत्र’ है ।
प्राचीन समय में हमारे ऋषि लोग दोनों प्रकार के ब्रह्मचारी होते थे । बहुत से आर्य राजा भी ब्रह्मचर्य की सिद्धियों प्राप्त कर