ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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वीर्य के पकने का काल
जाते हैं। इसका कारण यह है कि वे अपने वीर्य का नाश कर इस अवस्था को पहुँचते हैं।
हमारे मत से भी वैद्यानिकों का यह सिद्धान्त बहुत सत्य प्रतीत होता है। वीर्य में अवश्य जीवाणु हैं। इन्हीं के चल पर जीवन स्थिर है। इन्हीं के नष्ट हो जाने से लोग हव वीर्य और नपुंसक हो जाते हैं। इन्हीं के कारण सन्तानोत्पत्ति होती है।
अनो घसति सर्वसिन्धेहे तत्र विरोधतः।
वीर्य रक्त मले यस्मिन् चीरि याति क्षयं क्षणतः॥
(वैशक)
जीव देह में सब स्थानों में रहता है, पर वीर्य, रक्त और मल में विरोध रूप से बसता है, जिसके नष्ट होने से क्षय भर में मृत्यु का नाश हो जाता है।
६—वीर्य के पकने का काल
धातो रसदौ मरजान्ते, मृत्येकं कृमतो रसः।
अहो रात्रात्सर्वं पञ्च, सार्थं दण्डञ्च तिष्ठति॥
(महामान्य शोक)
रस से लेकर मज्जा तक मृत्येक धातु पाँच रात दिन और देह घड़ी तक अपनी अवस्था में रहती है। तदनन्तर वीर्य बनता है। अर्थात् ३० दिन-रात और ९ घड़ी में रस से वीर्य की वत्पत्ति होती है।
सभी चिकित्सकों का मत है कि एक मास के पश्चात् पुरुष-
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