भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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५—वीर्य पर वैज्ञानिक दृष्टि

“अप्ताद्वेतः वेतसः पुरुषः ।”

(तैत्तिरीयोपनिषद्)।

अन्न से वीर्य और वीर्य से पुरुष उत्पन्न होता है ।

“शुक्रायच्छच्छ जीवितम् ।”

( भ. गी. )

मनुष्य का जीवन उसके वीर्य के अधीन है ।

पाश्चात्य देशवासी इस समय आविष्कार करने में भारतीयों से बहुत बढे-चढे हैं । उनके आविष्कार संसार में विशेष गौरव पा रहे हैं । जहाँ उन्होंने अनेक आविष्कार किये, वहाँ भला शरीर जैसे भौतिक पदार्थ के विषय में अन्वेषण न करते, तो कैसे बनता ! उन्होंने यह बात सिद्ध की है कि मानव-शरीर में असंख्य जीव हैं । वीर्य, रक्त और भल में भी अगणित जीवाणु होते हैं । इन्हीं जीवाणुओं की शक्ति से शक्ति, वृद्धता से वृद्धता और मृत्यु से मृत्यु होती है । एक विन्दु वीर्य में भी कोट्यधिक जीवाणु होते हैं । वीर्य-पात से शरीर के जीवाणुओं का नाश होता जाभा है, जिससे मनुष्य शीघ्र मरता है । यदि ब्रह्मचर्य से वीर्य की रक्षा की जाय, तो ये ही जीवाणु शरीर को बलशाली, कान्तिमाल और दीर्घायु बनाने का काम करते हैं ।

वैज्ञानिकों ने भी ब्रह्मचर्य को महत्व दिया है । उनका मत है कि जीवाणुमय वीर्य के संरक्षण से ही मनुष्य स्वस्थ और सुखी रह सकता है । न्यभिचारी पुरुष प्रायः अस्वस्थ और दुखी देखे