ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
पृष्ठ 254, कुल 380 में से
संदर्भ में पढ़ें२५१
वीर्य के पकने का काल
एक मास से पहले मैथुन का निषेध क्यों किया गया है ? वह इसीलिये कि इससे पहले वीर्य के बाहर निकलने से सब धातुओं में चीण्णा आ जाती है । धातुओं में चीण्णा आ जाने से, शरीर के सब अवयव निर्मल हो जाते हैं, और रोगों की वृत्तति होती है ।
हमारे विचार से एक मास के पश्चात् वीर्य का पकना अत्यन्त स्वाभाविक है । इसका प्रमाण यह है कि स्त्रियों का श्रद्धा-काल भी एक मास के पश्चात् ही आता है । यदि यह बात प्राकृतिक न होती, तो ऐसा क्यों होता ! परमात्मा ने स्त्रियों को गर्भ धारण करने के लिये तथा पुरुषों को गर्भाधान के लिये ही बनाया है । प्रधानतया मैथुन का भी उद्देश्य यही है ।
साधारणतया पुरुषों के वीर्य के पकने में एक मास का समय लगता है, पर इस निश्चित समय के कुछ पहले और पीछे भी ऐसा होता है, इसका प्रधान कारण शारीरिक बलायल सम्मंला चाहिये ।
बलवान मनुष्य के शरीर में आहार की रसादि क्रियायें शीघ्रता से होती रहती हैं । इसलिये उसका वीर्य भी कुछ पहले-ही पक जाता है, पर दुर्बल मनुष्य का वीर्य और भी अधिक दिन में पकता है । इसका कारण यह है कि उसके शरीर में आहार की रसादि क्रियायें देर में होती हैं । यही बात स्त्रियों के रज के सम्बन्ध में भी पूर्ण रीति से घटती है ।
अब हम एक मास के पश्चात् उत्पन्न होने वाले वीर्य तथा रज के कुछ सदृश गुण नीचे लिखते हैं—
१—एक मास के पश्चात् जो वीर्य या रज उत्पन्न होता है, वह अत्यन्त जीवन्ती-शक्ति से भरा हुआ होता है ।