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ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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वीर्य के पकने का काल

एक मास से पहले मैथुन का निषेध क्यों किया गया है ? वह इसीलिये कि इससे पहले वीर्य के बाहर निकलने से सब धातुओं में चीण्णा आ जाती है । धातुओं में चीण्णा आ जाने से, शरीर के सब अवयव निर्मल हो जाते हैं, और रोगों की वृत्तति होती है ।

हमारे विचार से एक मास के पश्चात् वीर्य का पकना अत्यन्त स्वाभाविक है । इसका प्रमाण यह है कि स्त्रियों का श्रद्धा-काल भी एक मास के पश्चात् ही आता है । यदि यह बात प्राकृतिक न होती, तो ऐसा क्यों होता ! परमात्मा ने स्त्रियों को गर्भ धारण करने के लिये तथा पुरुषों को गर्भाधान के लिये ही बनाया है । प्रधानतया मैथुन का भी उद्देश्य यही है ।

साधारणतया पुरुषों के वीर्य के पकने में एक मास का समय लगता है, पर इस निश्चित समय के कुछ पहले और पीछे भी ऐसा होता है, इसका प्रधान कारण शारीरिक बलायल सम्मंला चाहिये ।

बलवान मनुष्य के शरीर में आहार की रसादि क्रियायें शीघ्रता से होती रहती हैं । इसलिये उसका वीर्य भी कुछ पहले-ही पक जाता है, पर दुर्बल मनुष्य का वीर्य और भी अधिक दिन में पकता है । इसका कारण यह है कि उसके शरीर में आहार की रसादि क्रियायें देर में होती हैं । यही बात स्त्रियों के रज के सम्बन्ध में भी पूर्ण रीति से घटती है ।

अब हम एक मास के पश्चात् उत्पन्न होने वाले वीर्य तथा रज के कुछ सदृश गुण नीचे लिखते हैं—

१—एक मास के पश्चात् जो वीर्य या रज उत्पन्न होता है, वह अत्यन्त जीवन्ती-शक्ति से भरा हुआ होता है ।

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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२—ऐसे वीर्य तथा रज को गर्भोधान के अतिरिक्त किसी न्यर्थ सम्भोग में न व्यय करना चाहिये।

३—ऐसे अमूल्य वीर्य तथा रज की आवश्यकता न हो, तो शरीर से पृथक् न करना ही उत्तम है।

४—ऐसे वीर्य रज से कान्ति, आयु, शक्ति, बुद्धि, ज्ञान, सहिष्णुता, नीति, तेजस्विता तथा विनय-शीलता की वृद्धि होती है।

५—एक वर्ष के ब्रह्मचर्य से शरीर में अपरिमित वीर्य हो जाता है, जिससे की मनुष्य सब कुछ कर सकता है।

७—वीर्य का स्थान और परिमाण

शुक्ल सौम्यं सितं क्षिप्यं, बल पुष्टिकरं स्मृतम् । गर्भबीजं वपुः सारो, जीवस्याश्रयः स्मृतम् ॥

( वैश्व-गान् )

शुक्ल ( वीर्य ) जीवनी शक्ति का बढ़ाने वाला, श्वेत-वर्ण, चिकना बल तथा पुष्टि कारक होता है। यह गर्भ का बीज, शरीर का सार रूप तथा जीव का प्रधान आश्रय होता है।

वीर्य के स्थान और परिमाण के सम्बन्ध में बहुत से लोगों के मन में कुधारणार्थ उत्पन्न हो गई हैं। अतएव हम महर्षियों के लेख से दोनों बातों का निराकरण किये देते हैं।

यथा पयसि सर्पिस्तु, गृहश्वेत्तौ रसो यथा । प्रवं हि स्रकले काये, शुक्लं तिष्ठति देहिनाम् ॥

( वैश्व० )

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वीर्य का स्थान और परिमाण

जैसे दूध में घी और ईल में रस गुप्त रूप से ( दिखलाई नहीं पड़ता ) रहता है, उसी प्रकार प्राणियों के शरीर भर में वीर्य भी रहता है।

वास्तव में मनुष्य-शरीर में वीर्य के लिये कोई नियत स्थान नहीं है। यह सर्वत्र में व्याप्त है। जिस अन्त से वीर्य की सचा छू जाती है, वह शून्य हो जाता है। यदि वीर्य एक स्थान पर रहने वाला पदार्थ होता, तो इसके संरक्षण या नाश का मला-बुरा प्रभाव क्या सच अज्ञों पर न पड़ता ?

पृथक् स्वप्नसूक्तं प्रोक्तमोजोमस्तिभक्तैरत्नसाम् । द्वावरुजली तु स्तन्त्यस्य, चत्वारो रजसखियाः ॥

( बृहद वाग्भट्ट )

ओज, मस्तिष्क और वीर्य का मान पुरुष के अपने एक पसरा ( चुल्हा ) के बराबर होता है। और स्त्रियों के दूध का परिमाण दो अँजुली तथा रज का चार अँजुली है।

ऊपर दिया हुआ वीर्य और रज का परिमाण, स्वस्थ पुरुष और स्त्रियों का समझना चाहिये। अस्वस्थ पुरुष और स्त्रियों में रज का परिमाण इतना नहीं हो सकता।

कुछ लोगों का मत है कि ४० कवर आहार से १ बिन्दु रक्त और ४० बिन्दु रक्त से १ बिन्दु वीर्य उत्पन्न होता है।

हमारे देश के कुछ वैज्ञानिकों का अनुमान है कि १ तोला वीर्य के लिये १ सेर रक्त और १ सेर रक्त के लिये १ मन आहार की आवश्यकता होती है।

अब पाठक भली भाँति समझ गये होंगे कि वीर्य का प्रभाव

महात्म्य-विज्ञान

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सर्वाङ्ग पर होता है। वीर्य से ही सब इन्द्रियों में उचित शक्ति रहती है। वीर्य कितना अमूल्य पदार्थ है। यह कितने शत्रु से बनता तथा प्राप्त होता है। उसकी यदि अवहेलना की जाय, तो इससे बद्ध कर क्या मूर्खता होगी ? अतः जो लोग अपनी रक्षा चाहते हैं, वे सावधान हो कर मन, वचन तथा कर्म से अपने वीर्य की रक्षा करें।

८—सम्भोग से वीर्य-स्त्रवण

कृत्स्न देहस्थितं शुक्तं, प्रसन्न मनसस्तथा ।

स्त्रीपुत्रुषायच्छ्रुतश्चापि, हर्षात्तत्सम्प्रवर्तते ॥

( वैष्णक )

समस्त शरीर में रहने वाला वीर्य, प्रसन्न चित्त वाले पुरुष के स्त्री-सहवास से प्रवृत्त होता है। अर्थात् एकत्र होकर बाहर निकल जाता है। इसका कारण एक प्रकार का इन्द्रिय-सम्बन्धी आनन्द ( उद्रेक ) है। यही बात स्त्रियों के सम्बन्ध में भी घटती है। पुरुष के शारीरिक सम्बन्ध होने से उनका भी धातु-पात होता है।

वैष्णक-शास्त्र में लिखा है कि कामदेव के वेग से पुरुष और स्त्री के सम्भोग के कारण सारे शरीर में रहने वाला वीर्य, भीतरी अग्नि और वायु की प्रेरणा से एकत्र हो जाता है। वही हर्ष के व्यत्पन्न होने से अन्त में बाहर हो जाता है। जैसे दही के मध्यमें रहने से घी के कण इकट्ठे हो जाते हैं, और बिलोने से एक में

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वीर्य के कार्य

मिल कर वाहर आ जाते हैं, उसी प्रकार संघर्षण के कारण सब अङ्ग में रहने वाला वीर्य भी एकत्र हो कर निकल जाता है।

द्वधल्ले दक्षिण पार्श्व, वस्तिद्वारास्थ चाण्यधः।

मुञ्जस्रोतः पथे शुक्रं, पुरुषस्य प्रवर्तते ॥

दाहिने पंसवादि से दो अंगुल वस्ति-द्वार के नीचे, मूत्र के स्रोत के मार्ग से मनुष्य का वीर्य निकलता है।

रित्रियों का भी पुरुष के साथ सहवास से वीर्य-पात होता है, अन्यथा नहीं।

पुरुष-स्त्री का सम्भोग ही वास्तविक वीर्य-स्खलन का कारण होता है। इसके विरुद्ध जितने अन्य कार्य वीर्य के बाहर निकालने वाले हैं, अस्वाभाविक और हानि-कारक होते हैं। इस सम्भोग का भी विधान उचित समय के लिये ही किया गया है। अतः हम निवेदन करते हैं कि सम्भोग के अतिरिक्त वीर्यपात के कारणों से बचने का प्रत्येक पुरुष-स्त्री को प्रयत्न करना चाहिये। वह सम्भोग भी नियत तथा शाश्वत समय पर ही हितकर तथा आनन्द-वर्द्धक हो सकता है।

६—वीर्य के कार्य

यथा सहस्र ध्माते तु, न मलं किलं काञ्चने।

तथा रसे मुहुः पक्वे, न मलं शुक्रात् गते ॥

(वैश्वक)

जैसे सोने को सहस्र बार तपाने पर उसमें मल नहीं रह जाता, उसी प्रकार रस के कई बार पकते रहने पर, जब वीर्य बन

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जाता है, तब उसमें फिर मल नहीं रहता। अर्थात् वीर्य के परचात् फिर कोई क्रिया रोप नहीं रहती।

हम पहले कह चुके हैं कि शरीर का सार वीर्य ही है। यही इसका आधार भी है। अतएव इसके कार्य भी बड़े महत्व के हैं। वे नीचे दिये जाते हैं:—

(१) वीर्य ही हृदय को पुष्ट तथा कर्तव्यशील बनाता है।

(२) वीर्य से ही सर्वाङ्ग में जीवनी-शक्ति सञ्चालित होती रहती है।

(३) वीर्य से ही मस्तिष्क शान्त और विचार-शक्ति-सम्पन्न रहता है।

(४) वीर्य से ही दृष्टि तथा श्रवण-शक्ति स्थिर रहती है।

(५) वीर्य से ही निर्भयता, स्वतन्त्रता, चत्ताह, साहस तथा पराक्रम आदि गुण बढ़ते हैं।

(६) वीर्य से ही आलस्य, रोग, निर्बलता, कलुषता, दुःख, अज्ञान तथा अविनय आदि दुर्गुण दूर किये जा सकते हैं।

(७) वीर्य के बिना सभी कार्य असिद्ध हो जाते हैं।

(८) वीर्य ही सन्तानोत्पत्ति का मूल है।

(९) वीर्य मनुष्य की सुन्दरता, सम्भ्यता, पवित्रता, धैर्य, पुरष तथा सद्व्यवहार का कारण है।

(१०) कहने का सारांश यह है कि शरीर में वीर्य ही सब कुछ कार्य करता है। इसकी हीनता से सारे व्यापार हीन हो जाते हैं।

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जरा और मृत्यु

१०—जरा और मृत्यु

“मा पुत्रा जररतो मृयाः ।”

( अथर्ववेद )

हे जीव ! तू वृद्धता से पूर्ण मत मर ।

“वृद्धत्वे जीवन-न्ययम् ।”

वृद्धता के आने पर ही आगुर्वल का नाश होता है ।

आज कल भी मनुष्य के मरने की अवस्था वृद्धता मानी गई है । जो लोग वृद्धता से पहले अपनी ऐहिक लीला समाप्त कर देते हैं, उनके लिये लोग बहुत शोक करते हैं, पर इस बात पर जरा भी ध्यान नहीं देते कि किस कारण से उसकी झकास मृत्यु हुई । प्राचीन काल में वृद्धता से पहले लोग मरते ही नहीं थे । जिसके राज्य में कोई बालक या युवा मर जाता था, वह राजा अचरमी समझा जाता था । श्रीराम के राजत्व में एक ब्राह्मण का युवा पुत्र मर गया, सो उस ब्राह्मण को बड़ा आश्चर्य हो गया था । उस समय की और आज की परिस्थिति में आकाश-पातल का अन्तर हो गया है । सौ में एकाध पुनः ही अपना वृद्धता को प्राप्त कर सकते हैं । शेष नित्यानन्द लोग बाल्य और युवावस्था में ही इस संसार से चल बसते हैं ।

इस दुःखमयी वार्ता का एक मात्र कारण ब्रह्मचर्य का अभाव है । जब तक इस देश में ब्रह्मचर्य का सुधार तथा प्रचार नहीं होता, तब तक इसका रोकना सम्भव नहीं ।

मनुष्य-शरीर की तीन अवस्थायें मानी गई हैं । बाल्य, और युवा के पश्चात् वृद्धावस्था होती है । इसलिये इस समय से पहले मरना पाप का कारण समझना चाहिये । अपने धीर्य की

ब्रह्मचर्य-विमान

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२३वा करने वाला पुरुष इससे पहले कभी भर नहीं सकता ! इस कथन को हम सुवर्ण के पत्र पर निर्भयता से लिंक सकते हैं ।

शारीर के सम्बन्ध में विशेष अनुभव की बात कहने वास ग्रन्थ आयुर्वेद माना जाता है । उसकी भी सम्मति है कि मनुष्य का जीवन उसके शारीरिक-गठन पर निर्भर करता है । आयुर्विज्ञान के प्राचीन आचार्यों ने बहुत कुछ इस सम्बन्ध में अनुसन्धान किया है । उनकी बातें कभी भूटी नहीं हो सकतीं ।

पर आज तो अवस्था उसके विपरीत है । ऐसा क्यों हुआ ! दिन पर दिन ब्रह्मचर्य का लोप होता गया । विलासिता और व्यभिचार के कारण मनुष्य-जाति अपने ईश्वर-दूत दीर्घ-जीवन रूप अधिकारों को खोती गई और वह इतनी पतित होती जा रही है कि अपना आयुर्वेद रखते हुये भी अकाल मृत्यु के मुख में पड़ रही है । अतः हम चल पूर्वक इस बात को कहते हैं कि यदि मानव-जाति पुनः अपना पत्थन करना चाहती है—फिर भी वह अपने आयुर्वेद की प्राचीन वैद्यक कथितोक्त मर्यादा बौधन चाहे, तो ब्रह्मचर्य की प्रणाली के प्रचार और विधिवत सुधार में देर न लगावे ।

हमें पूरा विश्वास है कि १२० वर्ष के आयुर्भोग के लिये हमारी आश्रम-प्रणाली ही पर्याप्त होगी । इससे अधिक भी दीर्घ-जीवन प्राप्त किया जा सकता है, पर वह योगाभ्यास की क्रिया के अधीन है !

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आयुर्वेद का कारण

११—आयुर्वेद का कारण

हृदय चेतनास्थान भोजसन्ध्याश्रयं मतम् । शरीर प्राणयोरैर्व, संयोगादायुक्त्येत ।

( शार्द्वर-संहिता )

हृदय चेतनता का स्थान और ओज का आश्रय-ज्ञाता है । इस प्रकार शरीर और प्राण के संयोग का नाम 'आयु' है ।

मनुष्य-शरीर में हृदय एक बहुत ही उत्तम तथा आवश्यक पदार्थ है । महर्षियों का मत है कि गर्भ में भी पहले पहले इसका आढुआव होता है ।

चेतन तथा ओज का भी यही स्थान है । यहाँ से रक्त का सञ्चालन और शुद्धीकरण होता है । प्राणों का भी इससे वनिष्ठ सम्बन्ध है । जिस हृदय का हम इस प्रकार वर्णन कर रहे हैं, वही आयु का भी कारण है । जिसका हृदय निर्वल हो जाता है, वह बहुत कम दिनों तक जीती है । इसलिये हृदय की पुष्टता आयु के लिये विशेष आवश्यक होना है । अतएव 'हम हृदय के पुष्ट रखने के लिये कुछ प्रधान बातें बतलाना चाहते हैं'—

( १ ) वीर्य-रत्ना से ही हृदय पुष्ट तथा कार्यकारी बन सकता है ।

( २ ) माषायाम से वीर्य-रत्ना हो सकती है और हृदय स्वस्थ रह सकता है ।

( ३ ) व्यायाम से हृदय की शक्ति बढ़ती रहती है ।

( ४ ) उत्तम आहार से वीर्य बनता है और हृदय बलवान होता है ।

अहर्चार्य-विज्ञान

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(५) नीरोग रहने से हृदय कभी चीखा नहीं होता। ऊपर लिखी हुई बातों से हृदय चलिष्ट और हर्षित रहता है। और यही हृदय आयु का कारण है। इसलिये जो लोग आयु के इच्छुक हों, वे अपने हृदय की रक्षा करते रहें। ऐसे कार्य न करें, जिससे कि उनका हृदय निर्बल हो जाय !

१२—वीर्य-च्य से राजरोग

“नष्टे शुक्ले सर्वे रोगा भवन्ति।”

(सूक्त)

वीर्य के अभाव में अनेक रोग उत्पन्न होते हैं।

यह बात बहुत सत्य है कि जिसके शरीर में वीर्य की कमी हो जाती है, उसके शरीर में नाना प्रकार के रोग घर कर लेते हैं। वीर्य-नाश से जिन महा रोगों की उत्पत्ति होती है, हम उनमें से कुछ प्रधान रोगों का यहाँ संक्षिप्त रूप से वर्णन कर देना चाहते हैं:—

(१) प्रमेह

जब मनुष्य का वीर्य विगड़ कर स्पर्श शरीर से किसी न किसी रूप में बाहर निकलने लगता है, तब उसे ‘प्रमेह’ कहते हैं।

प्रमेह का नाम लेते ही एक घार हृदय घड़कने लगता है। यह अत्यन्त भयङ्कर और भारत-व्यापी रोग है। वैद्यक-शास्त्र में जन्म के छेत्र से यह २० प्रकार का माना गया है। इसकी अन्तिम

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वीर्य-ज्ञय से राज रोग

अवस्था में प्राणों का नाश हो जाता है । इसके उत्पन्न होने के निम्नलिखित कारण बतलाये गये हैं :—

अधिक वीर्य नष्ट करने से—कुसमय में सम्भोग करने से—प्रकृति-विरुद्ध कार्य करने से—नया पान, गुड़, दही, दूध, तैल, मिर्ची और खट्वाई आदि अधिक खाने से—विशेष मछली-मांस के सेवन से तथा कफ-वर्द्धक पदार्थों के खाने से प्रमेह रोग उत्पन्न होता है । सब प्रकार के प्रमेह चिरस्थायी नहीं होते, पर वीर्य-ज्ञय से जो उत्पन्न होता है, वही हानिकारक होता है ।

आजकल प्रायः १५ सैकड़े लोग इस प्राण-विनाशक रोग के हाथ में पड़े हुये हैं । बहुत से लोग ऊपर से देखने में बड़े दृष्ट-पुष्ट दीखते हैं, पर भीतर ही भीतर उनमें प्रमेह बढ़ता रहता है । पहले तो इसका लोगों को ज्ञान नहीं होता, पर जब यह प्रवल हो जाता है, तब लोगों को इसकी चिन्ता व्यापती है । यदि अच्छे चिकित्सक से काम पड़ा और उसके कहने के अनुकूल संयम किया गया, तब तो कुछ आशा होती है, नहीं तो भरकर ही मनुष्य को इससे मुक्ति होती है ।

प्रमेह में सर्वाङ्ग का वीर्य मूत्र के साथ अनिच्छापूर्वक बाहर निकलाने लगता है । जब यह अधिकघट जाता है, उस अवस्था में सब धातु इसी के साथ गल-गल कर शरीर के बाहर हो जाती हैं । वह मनुष्य निस्तेज, दुर्बल, पीला, अज्ञानी, डन्मादी और चिड़चिड़ा हो जाता है । उसे भोजन नहीं पचता, दस्त ठीक नहीं होती—निद्रा अच्छी तरह से नहीं आती और मस्तिष्क में सौंय-सौंय शब्द होते रहते हैं । ज़मेही पुरुष मरण से बढ़कर कष्ट सहता हुआ योद्धे ही दिनों में काल का प्राप्त बनता है ।

प्राप्तचर्य-विधान

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(२) च्युत या यच्छा

इसमें शरीर के बारे दोष प्रकृत होकर नष्ट होने लगते हैं और हृदय और कुण्डल अस्मत्त हो जाते हैं । इसी को 'च्युत' कहते हैं । च्युत या यच्छा भी प्रसूत की शक्ति घटा भयानक संक्रामक रोग है । अनेक नवयुवक इसके कारण अपने प्राणों को असमय में खो बैठते हैं ।

इसके प्रारम्भ होने के भी कई कारण हैं, पर सर्व-प्रधान कारण वीर्य-नाश ही है । जो पुरुष वात्सावरथा से ही विषय-वास-नाओं में कैसफ़र, अपनी आत्मरिक्त धातुओं को दुर्बल कर खालते हैं, वे कदापि इससे नहीं बच सकते ।

इसने अपनी आँखों देखा है कि जीवनारथा में सरने वाले पुरुष प्रायः इसी रोग से ग्रस्त होते हैं । बहुत सी युवती दुष्क-मित्री नियों भी इस रोग से ग्रस्ती हैं । अत्युभित रूप में वीर्य का च्युत करने से हृदय और कुण्डल में रक्त के सञ्चालन और शोधन की शक्ति नहीं रह जाती । यीथोदि सात प्रातुओं के धनने की किया नष्ट हो जाती है । दिन पर दिन विकार बढ़ता जाता है । मन्दाग्नि, अग्नि, संयुग्मणी और वातव्याधि आदि रोग भी इसके कारण उत्पन्न हो जाते हैं । मनुष्य सर्वोद्भूत से वीर्य होकर एक दिन अकाल मृत्यु से मारा जाता है ।

इस रोग के प्रारम्भ में वीर्य-रक्षा का कड़ा नियम है । इस किया से इस च्युती मनुष्य का जीवन कुछ बढ़ जाता है । यदि इसने पर भी इन्द्रिय-लोहपता न दृष्टी, तो वह मनुष्य और भी पहले निष्प्राण होकर, अपने कुल वालों को शोक में छोड़ जाता है ।

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वीर्य-च्युत से राजयोग

(२) स्वप्न दोष

“नास्ति जागरितो भयम् ।”

( चाणक्य नीति )

जागृत रहने वाले पुरुष को किसी प्रकार का भय नहीं रहता। रोगों में ‘स्वप्न-दोष’ भी अत्यन्त भयङ्कर रोग है। जिसे एक बार लग जाता है, उसके प्राणों की बचती है। इसकी भी अन्तिम अवस्था मृत्युकारक होती है।

यह रोग विद्याथियों और विवाहित पुरुषों का जन्म-संघाती हो जाता है। हमने बहुत से लोगों को इससे पीड़ित देखा है।

स्वप्न-दोष से मुख की प्रसन्नता जाती रहती है—दुष्टि नष्ट हो जाती है—हृदय में दुर्बलता आ जाती है—चित्त में हर समय उदासीनता रहती है और कहीं भी शान्ति नहीं मिलती। मेरुदण्ड तथा सिर में पीड़ा अधिक होती रहती है। स्मरण-शक्ति घट जाती है और अनेक शारीरिक रोग उत्पन्न हो जाते हैं।

रात में सो जाने पर जो दृश्य दिखलाई देता है, वह मनुष्य को सत्य जान पड़ता है। इसीसे वह उसमें लिप्त हो जाता है। कभी ऐसा जान पड़ता है कि एक दुवती खी आई और उससे जाकर सम्भोग करने लगता है। फिर क्या! चणमात्र में उसका वीर्य शरीर से बाहर हो जाता है और निद्रा दृढ़ जाती है। इस प्रकार वीर्य-च्युत का नाम स्वप्नदोष है। स्वप्न-दोष में वास्तविक खी-भ्रंशङ्ग से कहीं अधिक वीर्य-पात होता है। स्वप्न-दोषी पुरुष कुछ दिनों में अशक्त और हतवीर्य हो जाता है। इसके उत्पन्न होने के निम्नलिखित कारण हैं—

ग्रहचर्य-विज्ञान

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शरीर में अधिक शीतोष्णता के बढ़ने से—विरोध विकला पदार्थ के खाने से—अत्यन्त परिश्रम, चिन्ता और शोक से—उत्तान होकर सोने से—काम सम्बन्धी विचार कर सोने से तथा अस्वाभाविक या स्वाभाविक रीति से चर्य-नाश करने से यह विकार उत्पन्न होता है।

प्रारम्भ में इसे साधारण रोग समझ कर लोग छोड़ देते हैं जब प्रबल हो जाता है, तब किसी प्रकार नहीं रुक सकता। अन्त में शारीरिक तथा मानसिक समस्त शक्तियों को नष्ट कर प्राणों का घातक बन जाता है।

(४) नपुंसकता

“वीर्यवाहि शिराधारी, वृषणी पौरुषा चहो।”

(शार्ङ्गधर-संहिता)

वीर्य-वाहिनी शिराओं के आधार अण्डकोष होते हैं। और ही पुंसत्व के देने वाले हैं।

वैद्यक-शास्त्र में कई प्रकार के नपुंसकों का वर्णन है, पर जिस नपुंसक का हम वर्णन करते हैं, वह और भी विचित्र होता है। जो लोग दैवी प्रकोप से नपुंसक होते हैं, उन्हें तो कुछ कहन ही नहीं, पर यह नपुंसक अपने पुंसत्व को कुकर्मों द्वारा खो कर होता है।

भारतवष में इस 'नपुंसकता' का रोग दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है। इसकी चिह्नित्सा भा नहीं होती। इस नपुंसकता में बड़े बड़े लोग फँस जाते हैं। इसके उत्पन्न होने के निम्नलिखित प्रधान कारण हैं:—

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वीर्य-रक्षा से लाभ

(१) अत्यन्त मैथुन, बहुखी-गमन—बाल-विवाह तथा अनैसर्गिक सम्बन्ध से नपुंसकता उत्पन्न होती है।

(२) किसी कारणवश पुरुष होने की योग्यता न रहने का नाम “नपुंसकता” है। इस नपुंसकता में बूढ़ों की कौन कहे, योड़ी-योड़ी अवस्था के नवयुवक भी फँस रहे हैं। शिवा-दीवा का समुचित प्रबन्ध न रहने के कारण प्रकृति के नियमों के प्रतिकूल जाकर प्रसमय में ही लोग अपने पुंसत्व को खो बैठते हैं।

(३) जीवनसाधार अण्डकोषों की शक्ति क्षीण हो जाती है—शितेन्द्रिय में उत्तेजना नहीं रहती—तनिक भी कामेच्छा होते ही वीर्य स्खलित हो जाता है—संसार का साधारण से साधारण कार्य भी उनसे नहीं किया जा सकता और अपनी स्त्री से सुँद छिपाना पड़ता है। इस रोग का रोगी गर्भधान नहीं कर सकता। उसके वीर्य से यदि बालक हो भी जाय तो वह जीवा नहीं बचता।

(४) नपुंसक पुरुष प्रायः मूर्ख, रोगी, लोभी, क्रोधी, कामी, अल्पशक्ति अल्पशुद्ध होता है।

१३—वीर्य-रक्षा से लाभ

“ब्रह्मचर्यं सदा रक्षेदध्या मैथुनं पृथक्।”

(दश-रहिता)

काठ प्रकार के मैथुनों से परे जो ब्रह्मचर्य है, उसकी सदा स्त्रा करनी चाहिये।

“श्रवश्यमेव भोक्तव्यं, हृतं कर्म शुभाश्रमम्।”

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ब्रह्मचर्य-विधान

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मनुष्य को जित छूत शुभ या अशुभ कर्म का फल अवश्य मिलता है।

ब्रह्मचर्य का अभिप्राय वीर्य-रत्ना है। वीर्य ही जीवन और शरीर का राजा है। इसके सञ्चित करने का बड़ा महत्व है। हमारे आर्य ऋषियों की महत्ता और उच्च ज्ञान-तपोनिष्ठा का प्रधान कारण भी यही ब्रह्मचर्य था। बड़े-बड़े विद्वान्, ज्ञानी, शूरवीर, यशस्वी तथा तेजस्वी होने का यही एक मूल कारण है। इससे होनेवाले कुछ लाभों का हम यहाँ संक्षिप्त रूप से वर्णन करते हैं:—

(१) ब्रह्मचर्य के बल पर असाध्य से असाध्य कर्म अवि-लम्ब किये जा सकते हैं। इसीलिये कार्य की सिद्धि तक लोग ब्रह्मचर्य से रहते हैं।

(२) ब्रह्मचर्य की शक्ति से तेजोवीर्य, शान्ति और आत्म-ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। यह बात हमें ऋषियों के उपदेश से ज्ञात होती है।

(३) जो पुरुष देश, धर्म और जाति की सेवा तथा रत्ना करना चाहे, वह ब्रह्मचर्य से रहने का यत्न करे।

(४) अन्तःकरण के पवित्र और शान्त रखने के लिये ब्रह्मचर्य ही परमोपचय है।

(५) सदैव प्रसन्न और सुखी रहने का उपाय अक्षुण्ण ब्रह्मचर्य है।

(६) जीवन की सफलता; सुन्दर स्वास्थ्य, दृष्ट-गुष्ट अज्ञाता, कार्य-कारिता और-उद्यम-शीलता के लिये ब्रह्मचर्य अमृत रूप है।

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वीर्य-नाश से हानि

(७) सङ्कटेश्वर, सदाचार, खाल-शासन, खाधीन विचार और विभ-श्रेम, ये सब गुण ब्रह्मचर्य के वशीभूत हैं।

(८) सुसन्तान, खी-सुख, कुटुम्ब की अनुकूलता तथा सन्वन्धियों का सदुन्मवहार, सब की प्राप्ति ब्रह्मचर्य से होती है।

(९) ब्रह्मचर्य से ही अमृत का लाभ कर वासना रूपी क्रूरों को नाश किया जा सकता है।

(१०) ब्रह्मचर्य से ही, दिव्य-ज्ञान और सच्चे अनुभव मिलते हैं, जिनसे मनुष्य दुर्गमता तथा दुष्कर्मों से मुक्ति पा जाता है।

फलतः ब्रह्मचर्य की रक्षा से अलभ्य लाभ होते हैं। जो लोग इसे धारण करते हैं, वे ही इस के स्वाद को कुछ जान सकते हैं।

१४—वीर्य-नाश से हानि

“सर्वस्वातुष्टितं कार्यं, हन्यतेऽब्रह्मचर्यायां।”

(सक्ति)

मनुष्य का सब अनुष्ठान किया हुआ कार्य ब्रह्मचर्य के नाश से नष्ट हो जाता है।

“विवेक-प्रधानां, भवति विनिपातः शतमुखाः।”

(भर्तृहरि-शतक)

जो लोग विवेक से भ्रष्ट हो जाते हैं, वे षरावर पतित होते जाते हैं।

ब्रह्मचर्य के नष्ट होने पर अनेक उपद्रव खड़े हो जाते हैं। इसके दुष्परिणामों की संख्या भी नहीं लगाई जा सकती। फिर

ब्रह्मचर्य-विधान

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भी हम इसके अभाव से होने वाली हानियों का कुछ वर्णन यहाँ पर कर देना चाहते हैं:—

(१) ब्रह्मचर्य के नाश से अन्तःकरण अपवित्र और दुर्बल हो जाता है ।

(२) वीर्य-क्षय से मन मलीन, शरीर हीन और आत्मा अनुत्साही बन जाता है ।

(३) ब्रह्मचर्य का नाश करनेवाला पुरुष बिना तेल के दीपक की भाँति लुफ जाता है ।

(४) वीर्य-नाश से पद-पद पर विपत्तियाँ आती रहती हैं, जो रोकी नहीं जा सकती ।

(५) बड़े-बड़े पुरुष भी ब्रह्मचर्य से पतित होते ही संसार में आँसू हो गये ।

(६) वीर्य-क्षय से धातु-रोग, रक्तविकार, शिरोरोग, दृष्टि-हीनता, अजीर्ण, कोष्ठवद्धता, मन्थ, वात, पक्षाघात, मन्दाग्नि, हृदय हीनता, आलस्य, उन्माद, भ्रम, सुग्री, श्वास, भय आदि अनेक शारीरिक और मानसिक रोग उत्पन्न होते हैं ।

(७) वीर्य-नाश से आनन्द, साहस, धैर्य, वीरत्व, तेज, शान्ति, ज्ञान और सद्भाव आदि नष्ट हो जाते हैं ।

(८) वीर्य-नाश से बढ़ कर महा पातक है ही नहीं ।

(९) वीर्य-क्षय, धम और घ्न के क्षय का कारण बनता है ।

(१०) एक विन्धु वीर्य-नाश से असंख्य जीवों की हत्या होती है ।

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अमोघवीर्य और ऊर्ध्वरेता

१५.—अमोघवीर्य और ऊर्ध्वरेता

“ब्रह्मचारी न फाञ्चन श्राविमाञ्जलि ।”

( वात=ज्रा० )

ब्रह्मचारी को कभी किसी भौंलि का फट नहीं होता ।

“ब्रह्मचारी ब्रह्म ब्राजद्विभरि ।

तस्मिन्नेवाश्रयिविषेसमोत्ता॥”

ब्रह्मचारी तेजस्वी वीर्य का संग्रह करता है । इसलिये उसमें समस्त देवगण वास करते हैं ।

वीर्य-भेद से अमोघवीर्य और ऊर्ध्वरेता नाम के दो प्रकार के ब्रह्मचारी होते हैं । इन दोनों प्रकार के ब्रह्मचारियों से संसार की सेवा होती है । इसलिये ये सर्वश्रेष्ठ गिने जाते हैं ।

‘अमोघवीर्य’ का अर्थ है—अपरिमित वीर्य वाला—और ‘ऊर्ध्वरेता’ का अर्थ है—वीर्य को ऊपर धारण करनेवाला । अमोघवीर्य का यह लक्षण है कि उसका वीर्य कभी निष्फल नहीं होता । उसके वीर्य से एक बार में निश्चय पूर्वक गर्भोत्पात हो जाता है और ऊर्ध्वरेता का यह है कि उसका वीर्य स्नान में भी स्थलित नहीं होने पाता अर्थात् वीर्य उसके अधिकार में रहता है ।

ऊपर के कहे हुए दोनों प्रकार के सिद्ध ब्रह्मचारी हैं । त्रिबिम्ब ब्रह्मचर्य के पालन से प्रत्येक पुरुष अमोघवीर्य और ऊर्ध्वरेता बन सकता है । दो में से एक बनना ही ब्रह्मचर्य का सब्बा ‘प्रमाण-पत्र’ है ।

प्राचीन समय में हमारे ऋषि लोग दोनों प्रकार के ब्रह्मचारी होते थे । बहुत से आर्य राजा भी ब्रह्मचर्य की सिद्धियों प्राप्त कर

ब्रह्मचर्य-विद्यान

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चुके हैं। महवियों में वशिष्ठ, पराशर और यमद्वनि तथा राजाओं में सगर और धृतराष्ट्र अमोघवीर्य के उदाहरण हैं। देवव्रत भीष्म और महावीर हनुमान ऊर्ध्वरेता थे।

अमोघवीर्य की अपेक्षा ऊर्ध्वरेता बनना परम कठिन है। अमोघवीर्य अपनी सिद्धि से इच्छित सन्तान उत्पन्न कर सकता है, पर यह आशा ऊर्ध्वरेता के लिये नहीं है। उसे अपनी महावीर्यता से केवल संसार-सेवा करने का अधिकार है। अमोघवीर्य बनने के लिये नियमित ब्रह्मचर्य का पालन करना आवश्यक है, पर ऊर्ध्वरेता के लिये ब्रह्मचर्य के साथ साथ योग का भी अनुशासन है। अमोघवीर्य होने से सर्वोन्नत मनुष्य की गति होती रहती है। इससे शरीर बलवान हो जाता है—मानसिक शक्ति की वृद्धि होती है—उत्साह और साहस नहीं नष्ट होता—मुख की कान्ति नहीं घटती एवं शीघ्र वृद्धता नहीं आती। उसकी सन्तान में भी तेजस्विता, विद्वत्ता और गुणवत्ता स्वाभाविक होती है। ऊर्ध्वरेता होने से वीर्य कभी नष्ट नहीं होता। इसलिये सब शरीर वज्र बन जाता है—रोगों का आक्रमण नहीं होता—दिव्य-दृष्टि प्राप्त होती है तथा परमात्मा की भी अभिलम्ब प्राप्त होती है। यहाँ तक कि मृत्यु को भी अधिकार में किया जा सकता है। उस का कोई व्रत निष्फल नहीं हो सकता। अब पाठक अमोघवीर्य और ऊर्ध्वरेता होने का तात्पर्य भली भाँति समझ गये होंगे। इस समय हमारे देश और समाज को दोनों प्रकार के ब्रह्मचारियों की नितान्त आवश्यकता है। बिना इनके सुधार होने की आशा केवल निराशा है।