भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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स्त्रियों के दुराचारिणी होने से कुल, धर्म, जाति और देश का अधःपतन हो जाता है। जिस देश का नारी-समाज पतित होता है, वहाँ का पुरुष-समाज भी घुषित और अवनत स्वर्ग हो जाता है। यद्यपि स्त्रियों की दूषित करने का लाञ्छन पुरुषों पर ही लगाया जा सकता है, तथापि अज्ञानता के कारण स्त्रियाँ भी अपने नाश का कारण बन रही हैं।

हमने देखा है कि सधवा स्त्रियों की अपेक्षा विधवायें अधिक स्वस्थ और नीरोग रहती हैं। उनकी आयु भी बहुत बड़ी होती है और वे परिश्रम भी बहुत करती हैं। इसका प्रधान कारण हमें यही ज्ञात होता है कि उन्हें ब्रह्मचर्य-व्रत के पालन करने का अधिक अवसर मिलता है। पति के न रहने पर उनका जीवन संयमित और न्यभिचार रहित हो जाता है। ऐसा भी देखा गया है कि जो स्त्रियाँ अपने पति के जीवन-काल में बहुत अखस्थ रहती थीं, वे भी पति के मर जाने पर द्रष्टृ पृष्ट हो गई हैं।

अब हम स्त्रियों की उन दुर्बलताओं का वर्णन करते हैं, जो अति मैथुन तथा पापाचरण से उत्पन्न होती हैं:—

१—न्यभिचार से स्त्रियों का सौन्दर्य नष्ट हो जाता है।

२—युवावस्था में ही सब अङ्ग शिथिल हो जाते हैं।

३—बुद्धि, बल और गुणों का ह्रास होने लगता है।

४—गर्भ धारण करने की शक्ति नष्ट हो जाती है।

५—बहुत सी स्त्रियों के बालक नहीं होते, और होते भी हैं तो जीते नहीं।

६—राजयक्ष्मा, प्रदूर, रक्तवात-विकार, संयहृषी, शुल तथा अन्य प्राणनाशक रोग उत्पन्न हो जाते हैं।