ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
DevanagariHindipublished380 पृष्ठ
पृष्ठ 27, कुल 380 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 27
ब्रह्मचर्य-वैभव
[ षट्पदी छन्द ]
( १ )
उन्नतियों का सार धर्म का रथ है न्यारा ! सत्कर्मों का पुरष जाति का जीवन प्यारा ॥ सञ्जनता का मूल फूल है वैदिक वन का । सब सुख का है धाम-श्राम है सदगुण गण का ॥ ब्रह्मचर्य-सत् विश्व में, कल्प घृत्त आधार है ! इसकी महिमा से सदा, चलता सब व्यापार है ॥
( २ )
ब्रह्मचर्य से दिव्य भावनायें होती हैं ! ब्रह्मचर्य से दीर्घ-यातनायें खोती हैं ॥ ब्रह्मचर्य से ज्ञान और बल नर हैं पाते । ब्रह्मचर्य से शान्ति-मोक्ष को हैं अपनाते ॥ श्रद्धियों के उपदेश को, कभी न भाई भूलिये ! रक्षा करके बीयें की, अति खतन्त्र ही फूलिये ॥
—कविपुष्कर