भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य-वैभव

[ षट्पदी छन्द ]

( १ )

उन्नतियों का सार धर्म का रथ है न्यारा ! सत्कर्मों का पुरष जाति का जीवन प्यारा ॥ सञ्जनता का मूल फूल है वैदिक वन का । सब सुख का है धाम-श्राम है सदगुण गण का ॥ ब्रह्मचर्य-सत् विश्व में, कल्प घृत्त आधार है ! इसकी महिमा से सदा, चलता सब व्यापार है ॥

( २ )

ब्रह्मचर्य से दिव्य भावनायें होती हैं ! ब्रह्मचर्य से दीर्घ-यातनायें खोती हैं ॥ ब्रह्मचर्य से ज्ञान और बल नर हैं पाते । ब्रह्मचर्य से शान्ति-मोक्ष को हैं अपनाते ॥ श्रद्धियों के उपदेश को, कभी न भाई भूलिये ! रक्षा करके बीयें की, अति खतन्त्र ही फूलिये ॥

—कविपुष्कर